अच्छी शिक्षाः अव्यवहारिक शिक्षा

गुड़गाँव के एक प्रतिष्ठित निजि विद्यालय के दो छात्र मिलकर एक छात्र की गोली मारकर हत्या कर दी। मृतक छात्र आठवीं कक्षा में पढ़ते थे। हत्या करने वाले छात्र भी आठवीं के ही छात्र हैं। हत्या की वजह चाहे जो भी रहा हो, इस घटना के बाद समाज और सरकार को इस पर विचार करना चाहिए कि आखिर क्यों आजकल किशोर और युवा छात्र हिंसक एवं असभ्य होते जा रहे हैं। सारी सुख- सुविधाओं से सुसज्जित निजि विद्यालयों के छात्र को आखिर किस चीज की दरकार थी ? जिसका वजह से वे अपने सहपाठी की हत्या कर डाली ? क्या हमारी शिक्षा पद्धति में खामियाँ है, जिसकी वजह से छात्र सिर्फ किताबी ज्ञान हासिल कर पाते हैं, व्यवहारिक ज्ञान नहीं ले पाते हैं ? पहले छात्र परीक्षा में असफलता मिलने पर आत्महत्या करते थे, इस तरह सरेआम हत्या करना नई बात है। इस तरह गोली मारकर हत्या करना साफ साबित करता है कि वे मानवीय गुणों से बिल्कुल बंचित हैं। हो सकता है उसका पारिवारिक माहौल भी अच्छा नहीं रहा हो, लेकिन विद्यालय में उसे व्यवहारिक ज्ञान एवं सदगुणों के बारे में नहीं बताया गया, वर्णा इस तरह हिंसक नहीं होते।

आजकल अंग्रेजी माध्यम का जमाना है। हर माता-पिता की हार्दिक इच्छा होती है कि उसका बच्चा अंग्रेजी माध्यम के बड़े से बड़े निजि विद्यालय में पढ़े। इन विद्यालयों में शिक्षा का दान नहीं किया जाता है बल्कि विक्रय किया जाता है। जहां पहले विद्यालय को विद्या का मंदिर माना जाता था, वहीं अब विद्यालय एक मनोरंजक जगह बनकर रह गया है। जहाँ अपनी सभ्यता संस्कृति के लिए कहीं जगह नहीं है। किशोरवय में छात्र-छात्राए सेक्स-क्रीड़ा करते हैं, उसकी फिल्म बनाकर मजे लेते हैं। अपने सहपाठी की हत्या करते हैं। क्या सचमुच में विद्यालय आज विद्या का मंदिर रह गया है? न तो किसी कक्षा के पाठ्यक्रम में ईमानदारी, मानवता, दया, परोपकार, बड़ों का आदर करना, देशभक्ति जैसे पाठों का समावेश किया गया है, न ही इस विद्यालयों के प्राध्यापक, अध्यापक इसे पढ़ाना, बताना आवश्यक समझते हैं। इन विद्यालयों के छात्र भारतीय संस्कृति को छोड़कर पश्चात्य संस्कृति को जो वास्तव में कोई संस्कृति है ही नहीं जिसमें नंगापन, खुलापन. अभद्रता, अमानवीयता. उदंडता इत्यादि दुर्गुणों को अपनाकर गोरवान्वित महशूश करते हैं। परिणामतः ईमानदार लोगों को बेवकूफ और चरित्रवान लोंगो को अनपढ़/ मूर्ख माना जाने लगा है। ये अव्यवहारिक शिक्षा का ही परिणाम है। शिक्षा का बाजारीकरण कर प्रत्येक वर्ग के लिए जब तक अलग-अलग व्यवस्था होता रहेगा तब तक छात्र सच्चे या अच्छे नागरिक नहीं बन सकते हैं।

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