सहानुभूति नहीं सहायता चाहिए।

भारत का राष्ट्रीय खेल भले ही हाॅकी है, लेकिन हाॅकी खिलाडि़यों के प्रदर्शन से तो ऐसा लगता है कि इसे राष्ट्रीय खेल का दर्जा समाप्त का दिया जाए, एवं किसी नये खेल को मौका दिया जाए। ताकि कभी कभार हमारे खिलाड़ी एवं देश के हिस्से में एकाध पदक, इनाम वगैरह भी मिले। अगर मेरी माने तो ऐसे खेल को राष्ट्रीय खेल का दर्जा प्राप्त हो, जिसमें हम कभी नहीं हारें। आप शायद वैसे खेल का नाम भले नहीं बता सकते, लेकिन मैंने सोचा है। भारत का राष्ट्रीय खेल ‘ राजनीति’ होना चाहिए। आप फिर चकरा गये न। भला राजनीति भी कोई खेल है। शायद सामान्य ज्ञान के धनी लोंगो को ये हजम नहीं होगी, लेकिन यह सौलह आने सच है। खेलों का शुरूआत ही राजनीति से हुआ है। इसीलिए खेलों में भी राजनीति होती है। खेल और राजनीति में चोली-दामन का संबंध है। जरा सोचिये अगर राजनीति को खेल का दर्जा दे दिया जाए एवं इसे भारत का राष्ट्रीय खेल का दर्जा दे दिया जाए तो कोई हमें पदक लेने से रोक पाएगा। बिल्कुल नहीं। इस खेल में हमारे यहाँ के मूर्ख खिलाड़ी भी बड़े-बड़े विद्वान, धुरंधर को पटखनी दे देता है। जरा सोचिये पढ़-लिखकर आप बाबू बन गये, वे खेल-खेलकर आपको काबू कर लिये। खेल के चहेते दर्शक मैदान में अपने पसंदीदा टीम के खिलाड़ी के लिए घंटों बैठे रहते हैं या टी.वी. से चिपके रहते हैं,। तालियाँ बजाते हैं। पटाखें छोड़ते हैं। मिठाईयाँ बाँटते हैं। या नहीं तो हार जाने के बाद बोतल फेंकते हैं। टी.वी. फोड़ते हैं। भूख-हड़ताल करते हैं। यहाँ तक कि अपने खिलाडि़यों के घर की इंटों भी खोद लाते हैं। सड़े टमाटरों से एयरपोर्ट पर स्वागत के लिए तैयार रहते हैं। उसी प्रकार हमारे प्रस्तावित राष्ट्रीय खेल राजनीति के दर्शक यानि आम जनता अपने चहेते ज्यादातर मामलों में अपनी जाति या धर्म के खिलाड़ी का भरपूर सहयोग करते हैं। उनके लिए भूखे प्यासे नारे लगाते हैं। झंडे ढ़ोंते हैं। चंदा करते हैं। जरूरत पड़ने पर हत्या-अपहरण एवं बूथ कैप्चरिंग जैसे महापुण्य के काम भी करते हैं। इस खेल में अपने समर्थित खिलाडि़यों के जीत में जो आलौलिक आनंद मिलता है। वैसा ही दुख हार जाने के बाद होता है। तो ऐसे खेल को भला राष्ट्रीय खेल का दर्जा क्यों नहीं मिलना चाहिए।

आज जमाने को बदलने क लिए हमलोंगो न ठाना है। इसीलिए राजनीति जैसे खेल में भी नये-नये प्रयोग, नये-नये युवा चेहरे द्वारा किया जा रहा है। राजनीति भले ही किसी का पेशा न हो । माफ किजिये कोई राजनीतिज्ञ अपने पेशे के रूप में राजनीति को नहीं स्वीकारते हैं। लेकिन पेशेवर लोगों की संख्या हमारी राजनीति में बढ़ती ही जा रही है। एक तरह से यह खानदानी पेशा भी बनता जा रहा है। हाल के वर्षों में इस किस्म के कई राजनीतिज्ञों का राजनीति में शुभ प्रवेश हुआ है। युवाओं की नई सोच पुरानी राजनीति में वायदों एवं सहानुभुति के सहारे अपनी जमीन तलाश रही है। जिसमें नयापन कुछ भी नहीं है। इस कड़ी में कांग्रेस के युवराज माननीय राहुल गाँधी जी का ताबरतोड़ दौड़ा हो रहा है। वे भारत को देख रहे हैं एवं भारतीय उनको। वे आत्महत्या कर रहे किसानों के क्षेत्र में जाते हैं, उनका दुख-दर्द सुनते हैं, विपक्षी एवं स्थानीय शासन को कोसते हैं एवं फिर अगले पड़ाव की ओर चल पड़ते हैं। अगला पड़ाव आदिवासी बहुल क्षेत्र होता है। वे आदिवासियों को देखते हैं। उनकी दयनीय हालत को देखते हैं। उन पर हो रहे अमानवीय जुल्म के बारे में जानते हैं। फिर आगे बढ़ते हैं। भूखे किसान, बेवस आदिवासी के बीच से वे वृद्ध कांग्रेस एवं अपनी राजनीति के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं।

भारत गाँवों का देश हैं लेकिन अब यह किसानो का देश नहीं रहा। भारत का विभाजन हो रहा है, लेकिन लकीर अदृश्य है। एक तरफ इंडिया दूसरी तरफ भारत । इंडिया में वे सब कुछ है जो विकसित देशों को विश्व में वर्चस्व बनाये रखने की ताकत को चुनौति दे रहा है। अरबपतियों की संख्या बढ़ रही है। विदेशी कंपनियाँ इनके पास बिक रही हैं। तो दूसरी तरफ भारत है, जहाँ की 70 प्रतिशत आबादी गाँवों कस्वों में रहती है। जिसके पास आजादी के 60 साल बाद भी मूलभूत सुविधाएँ भी नहीं है। भारत के किसान कर्ज के बोझ क कारण आत्महत्या कर रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य से दूर इन भारतीयों के सपने दिखाया जाता है, लेकिन सपना पूरा किया जाता है इंडियन का।

आजकल युवराज इन भारतीयों के प्रति सहानुभुति दिखा रहे हैं। लेकिन उनकी सरकार देश की विकासदर बढ़ाने के लिए जी तोड़ परिश्रम कर रही है। इन भारतीयों को इस हाल में लाने का श्रेय किसको दिया जा सकता है। कांग्रेस को या अन्य विपक्षी दलों को। देश पर सर्वाधिक शासन कांग्रेस का रहा है। कांग्रेस का समीकरण भी अगड़ा मुस्लिम एवं दलित रहा है। फिर इनकी हालत आज तक सुधरी क्यों नहीं सिर्फ वायदों एवं सहानुभुति के सहारे शासन करते आ रहे है। । हलांकि इसे गलत नहीं कहा जा सकता है। राजनीति में वायदा कारोबार तो होता ही है जिसमें राजनेताओं को लाभ मिलता है। लेकिन यह सोच अब पुरानी हो चुकी है। अगर युवा नेता भी उसी राह पर चलना शुरू कर दें तो भारत का विकास करना तो दूर इसका वजूद बचाना भी असंभव हो जाएगा। किसानों और आदिवासियों के बीच जाकर कांग्रेसी युवराज सहानुभुति प्रकट कर रहें है। इससे किसानों आदिवायिों को क्या लाभ मिलेगा ? उनकी हालत सुधरेगी यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है। लेकिन उन्हें तत्काल सहायता की जरूरत है। ताकि वे खेती कर सके, पानी, बिजली, अनाजों की उचित दाम में बिक्री की समस्याओं से वे त्रस्त हैं। इन सब चीजों का सरकार को पुख्ता इंतजाम करना चाहिए। सिर्फ सहानुभुति प्रकट कर राजनीति तो की जा सकती है, देश की दशा नहीं सुधारी जा सकती है। कम से कम युवा राजनेताओं को इस पर सोचना चाहिए। कहा भी गया है-

लीक-लीक गाड़ी चले, लीकहीं चले कपूत।
लीक छोड़ तीनों चले, शायर, सिंह, सपूत।।

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