धर्म और राजनीति

भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में सभी धर्माें के अनुयायियों को समान अवसर प्राप्त होता है। धार्मिक आधार पर न तो भेदभाव किया जाता है न ही किसी धर्म विशेष के अनुयायियों को विशेष सुविधा दिया जाता है। लेकिन यह कटु सत्य है कि भारत में आजादी के शुरूआत से ही धर्म एवं जाति के नाम पर राजनीति की जा रही है। धर्म और जाति के नामक वायरस से ग्रसित भारतीय राजनीति का इलाज तो अब किसी भी धर्म के इष्टदेव से भी संभव होता नहीं दिख रहा है। धर्म अफीम के समान ही दिख रहा है। किसी भी धर्म का संबंध मानव मन के शुद्धिकरण से होता है, प्रेम की सर्वोच्चता सभी धर्मों में वर्णित है। वर्तमान समय में एवं भूतकाल में भी धर्मगुरूओं द्वारा स्वार्थ सिद्धि हेतु जो धर्म की व्यख्या एवं उपदेश दी जाती रही है, उससे प्रत्येक धर्म का मूल भाव का अस्तित्व ही आज खतड़े में दिख रहा है। किसी न सच ही कहा है-

कुपथ-कुपथ जो रथ दौड़ाता पथ निर्देशक है वो।
लाज लजाती जिसकी कृति से घृति उपदेशक है वो।

धर्म गुरूओं द्वारा धर्म का जो वर्तमान स्वरूप बनाया गया है उस पर शायद ही किसी सच्चे अनुयायी को गर्व होना चाहिए। रही सही कसर हमारे राजनेताओं ने पूरी कर दी है। परिणामतः धर्म का अस्तित्व खतड़े में नहीं है, वस्तुतः धर्म के कारण मानव समुदाय का अस्तित्व ही खतड़े में है। यह बात किसी से छिपी नहीं है। दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं है जहाँ धर्म के कारण अस्थिरता, अराजकता एवं भय का वातावरण नहीं हो फिर भी बहुत कम इस संबंध में बोलने का दुस्साहस करता है।

कोई भी धर्म धर्मगुरूओं की जागीर नहीं है, न तो राजनेताओं की पैतृक संपत्ति है। जिसे वे निज हित के लिए उपयोग करें। पता नहीं मानव समुदाय को यह बात समझ में क्यों नहीं आ रही है? दूसरे को कष्ट पहुँचाने वाले, किसी भी धर्म का सच्चा अनुयायी नहीं हो सकता।

वर्तमान धटना क्रम में कश्मीर में जो स्थिति उत्पन्न की गई है इससे हिन्दू और इस्लाम धर्म के सच्चे अनुयायियों को गंभीरता से सोचना चाहिए कि क्या जो किया जा रहा है धर्म संगत है ? शासकीय नीति को स्वार्थी राजनेताओं ने धर्म से जोड़ा और अब इस पर राजनीति कर रहे हैं। आज धार्मिक स्थल एवं पर्यटन स्थल में विशेष अंतर नहीं है। दोनों एक दूसरे का पर्याय बन चुका है। पर्यटन व्यवसाय की भांति भल-फूल रहा है एवं इससे करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी चल रहा है। इससे विकसित करने के लिए आधार भूत सुविधाएँ तो चाहिए ही। दर्शन करने हेतु श्रद्धालु अमरनाथ जितनी संख्या में जाऐगें, वहाँ के आम नागरिकों को उतना ही फायदा होगा। वहाँ के निवासी इसे धर्म के साथ जोड़कर नहीं देखे तो अच्छा है। अगर धर्म के साथ जोड़कर देखते हैं तो उनको स्वेच्छा से श्रद्धालुओं की सेवा करना चाहिए, जो अच्छे मानव का कत्र्तव्य है। सरकार एवं राजनीतिक दलों को भी ऐसे मामले पर राजनीति नहीं करना चाहिए। वर्णा आतंकवाद की समस्या झेल रहे जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था बरबाद हो जायेगा। वहाँ के निवासियों के सामने भुखमरी की समस्या उत्पन्न हो जायेगी।

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