आपकी बात : अपनी बात

व्यक्तिगतरूप से मैं धर्म, जाति, संप्रदाय या क्षेत्र के आधार पर मानव को बाँटने के पक्ष में नहीं हूँ। ये सभी विघटनकारी तत्व के कारण ही मानव समुदाय दो वर्गो में विभाजित हो गया। पहला शासक वर्ग और दूसरा शोषक वर्ग। आज के समय में अमीर और गरीब। इस तरह अगर आप समस्त मानव समुदाय का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो प्राचीन काल से ही वे मुख्यतः दो वर्गो में विभाजित होते रहे हैं। इन दोनों वर्गों का आप कुछ भी नाम दे सकते हैं। अभी भी विश्व के प्रायः सभी देशों में चंद लोगों के हाथ में ही धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक सत्ता का बागडोर है। सिर्फ कहने का लोकतंत्र है। अधिकांश जनता तो सिर्फ किसी प्रकार से अपना जीवन-यापन कर रहा है। किसी भी धर्म या जाति में जब कोई व्यक्ति जब धार्मिक या आर्थिक रूप से मजबूत हो जाता है तो अपने ही धर्म या जाति का या तो शोषक बन जता है या अपने समाज के विकास करने में अपने आप को असहाय महसूस करता है।

मानव इस पृथ्वी पर सर्वोत्तम प्राणी है। कोई भी मानव इस पृथ्वी पर अन्य सभी जीव-जंतुओं से उत्तम ही है। सिद्धांततः कोई भी मानव धर्म या जाति का उद्भव मानव को मानव से जोड़ने के लिए होता है , न कि तोड़ने के लिए। स्वार्थ के लिए धर्म ओैर जाति का निर्माण न तो हुआ था, न ही इसके कारण इसका विकास संभव है । इतिहास का पठन-पाठन भी इसीलिए तो होता है। इससे तो हमें यही सीख मिलती है कि जिस जाति, धर्म में प्रेम का अभाव हुआ उस पर किसी अन्य जाति, धर्म का हमला हुआ और अंततः वे गुलाम हो गया। हम जितने छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटते रहेगें, हम अवनति के पथ पर बढ़ते चले जाऐगें। और अंततः हम अभाव के गर्त में पड़े रहेगें। मानव समुदाय का यह दुर्भाग्य ही रहा है कि वे इन स्वार्थी तत्वों से अवगत होकर भी हमेशा से मूकदर्शक ही बना रहा है। अब स्थिति यह है कि हम चाहकर भी धर्म और जाति के दीवारों को तोड़ नहीं सकते। इस तरह के परिवर्तन लाने में सदियों बीत जायेगा। वर्तमान व्यवस्था में ही अपने लिए प्रगति का पथ ढ़ूँढ़ना होगा। जाति व्यवस्था में ही हमें सजग होकर सफल होना है। धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक स्तर पर सबल और समर्थ जाति को उच्च वर्ग माना जाता है। आर्थिक युग में किसी भी धर्म, जाति के व्यक्ति अगर आर्थिक रूप से सबल हैं तो वे प्रत्येक स्तर पर अपनी श्रेष्ठता मनवा सकते हैं। जरा सोचिये एक उद्योगपति के कामगार सभी धर्मों और जातियों के होते हैं। कामगार उद्योगपति के साथ कभी भी धर्म, जाति के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते।

प्रेम विवाह के अलावा भी आजकल हैसियत के हिसाब से कुछेक शादियाँ अलग-अलग धर्मों और जातियों के बीच हो रहा है और समाज में स्वीकार्य भी है। प्राचीनकाल और मध्यकाल में बड़े वर्गों के बीच अंतरजातिय शादियाँ होने का उल्लेख मिलता है। जाति व्यवस्था के कुछ सबल पक्ष भी है। प्रगतिशील लोग हमेशा इससे लाभ उठाते रहे हैं।

निषाद समुदाय में जबसे विखंडन शुरू हुआ तबसे समाज अवनति की ओर बढ़ते गया। जिस समाज में प्रेम का अभाव होता है, उसका विलुप्त होना तय है। आज निषाद समाज सैकड़ों जातियों, उपजातियों कुरी, गौत्रों में विभाजित है। परिणामतः यह समाज एक पिछड़े समाज का अभिप्राय बन चुका है। हमारे समाज के कुछ बुद्धिजीवियों, समाजसेवियों द्वारा काफी प्रयास के बाद अपने समाज के विभिन्न जातियों उपजातियों की सूचि बनाई गई है। क्षेत्र और भाषा के भिन्न होने के कारण अधिकांश लोगों को भ्रम होता है कि फलां जाति या उपजाति तो हमसे एकदम भिन्न है। वह हमारे निषाद समाज का हिस्सा कैसे हो सकता है। उनको आश्चर्य एवं अचंभा भी होता है। कभी- कभी मन में विरोधाभष एवं अदूरदर्शिता के कारण मन में विक्षोभ होना स्वाभाविक भी है। मेरा कमीज उनके कमीज से ज्यादा गंदे नहीं है। मतलब तो एक ही कि दोनों का कमीज गंदा है।

सामाजिक विकास के लिए आर्थिक और शैक्षणिक विकास जरूरी है और आजकल इन सबके लिए राजनैतिक विकास आवश्यक है, क्योंकि राजनीति ही वह धूरी है जिसके सहारे सभी प्रकार के विकास चल रही है। फूट डालो और राज करो की नीति आज भी उतना ही प्रसांगिक है, जितना आजादी के सौ, दो सौ या हजार साल पहले। यह अंग्रेजों की नीति नहीं थी बल्कि उसके बहुत पहले से ही हमारे देश में, देश को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटकर राज्य करने का चलन था। अभिजात्य वर्ग का यह पैतृक गुण था। हमारे धर्मग्रंथ में इसका स्पष्टरूप से तो प्रमाण है ही जिससे दुखी होकर कुछ सहृदय शासकों द्वारा जैन, बौद्ध एवं सिख धर्म का निर्माण हुआ। इतिहास से सबक सीखना अभिजात्य वर्ग या हमारे धार्मिक चिंतक, मठाधीश उचित नहीं समझा और वे लगातार समाज को विभजित करते रहे, जिससे सिर्फ धर्म कमजोर ही नहीं हुआ बल्कि धर्म और समाज दोनों अवनति के पथ पर बढ़ते रहा।

समाज को विखंडित करने से मुट्ठीभर लोगों को लाभ अवश्य हुआ और आज भी हो रहा है। पर अधिकांश हिस्सा निराशा और शोषण के गर्त में घिड़ा है। अलग- अलग पंथ, संप्रदाय का निर्माण कर अपना दुकान चलानेवाले धर्मगुरूओं, मठाधीशों का करतूत प्रत्येक दिन हमारे सामने प्रकट हो रहे हैं, लेकिन आम जनता आज भी सचेत नहीं हो रहे हैं। कारण आम जनता की मजबूरी है, वे इतने टुकड़ों में विखंडित हो चुके हैं कि अब संभलना असंभव सा लगता है। जरा सोचिये पंथ, संप्रदाय, जाति उपजाति कुरी गौत्र में विभाजित होकर हम अपने आपको कहाँ पाते हैंA सदियों से धर्म जाति उपजाति के नाम पर मानव द्वारा मानव का शारीरक, मानसिक और आर्थिक शोषण करना कहाँ तक उचित है भले ही सतही तौर पर हम तरक्की कर रहे हैं, पर समाज के निचले स्तर पर स्थिति जस के तस ही हैं क्यों , विभिन्न स्तरों पर हम बँटे हैं इसलिए कछ लोगों की दुकान चल रही है। सबाल यह है कि क्या हम कुछ कर सकते हैं? अगर हाँ तो तैयारी आज से शुरू करें। अगर यह असंभव लगता है तो संभव बनाने का प्रयास तो हम कर ही सकते हैं। हजारों वर्षों की बिमारी है लाईलाज तो लगेगा ही, इसे मिटाने में वक्त भी लगेगा। यदि अपने-अपने हिस्सा का काम कर डाले आज नहीं तो कल हम कामयाब हो ही जायेगें।

परिवर्तन लाने के लिए समाज को जागृत करना अति आवश्यक है। समाज में जागृति लाने का एक लक्ष्य निर्धारण करना होगा और उसपर ध्यान केन्द्रित करना होगा। हमारा लक्ष्य – समाज को एकीकृत करना। हमारा काम- अपना सोच बदलना। बस हमारा काम हो जागेगा, हमें कामयाबी मिल जायेगी। विशाल इमारतें भी दिवारें एवं स्तम्भों पर टिकी होती है और दिवारों का निर्माण छोटे-छोटे इंटों को जोड़कर किया जाता है। निषाद समाज आज कई प्रकार के जाति, उपजाति, कुरी, गौत्र इत्यादि में विभाजित है। इन टुकड़ों को एकत्रित कर समाज को सबल एवं समर्थ बना सकते हैं।……………

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