आत्मनिर्भर बनें, भाग्य भरोसे मत बैठें।

कुछ लोगों का कथन है -सारा संसार का संचालन सर्वशक्तिमान ईश्वर के द्वारा होता है। वे ही हमारे कर्मों (भाग्य) के निर्माता हैं। अतः जो वे चाहेंगे वही होगा। समस्त प्राणी उनके इच्छानुसार कार्य करते हैं। मनुष्य चाहे कितना भी कर्म या परिश्रम क्यों न करे। उन्हें प्राप्त उतना ही होगा जितना उनके भाग्य में लिखा होगा। ऐसे व्यक्ति अपना भूत-भविष्य और वर्तमान उत्थान-पतन के बारे में सोचते ही नहीं हैं। वे भाग्यवादी बनकर किसी ईश्वरीय चमत्कार की आशा में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं, जो उनके अवनति का कारण बन जाता है। यह अंधविश्वास कमजोर व्यक्तित्व वाले मनुष्यों में और अ​शिक्षित एवं अविकसित व्यक्ति परिवार एवं समाज में ज्यादा पाया जाता है।

अविकसित मनुष्य, परिवार एवं समाज कालांतर से ही भाग्यवाद के चंगुल में फँसा हुआ है, और आज भी भाग्यवाद के पोषक हैं। कुछ लोग तर्क देते हैं- भाग्य यदि साथ नहीं दे तो धन के लिए बहुत दौड़ धूप करना व्यर्थ है। भाग्य के बिना केवल दौड़ धूप से अगर लक्ष्मी की प्राप्ति होती तो बराबर दौड़ते रहने बाला कुत्ता भी धनी हो जाता, लेकिन सत्य बिल्कुल इसके विपरीत है-

उद्योगिनं पुरूष सिंहमुपैति लक्ष्मीदैवेन देयमिति कापुरूषा वदन्ति।
दैवं निहत्य कुरू पौरूषमात्मशक्त्यायत्ने कृते यदि न सिद्ध्यति कोत्र दोष:। (भर्तृहरि)

अर्थात् उद्योगी मनुष्य लक्ष्मी का उपार्जन करता है, परन्तु कायर मनुष्य भाग्य के भरोसे बैठा रहता है। अतः भाग्य को ठोकर मारकर उद्योगी पुरूष अपने कार्य में दृढ़ता से निमग्न हो जाता है, यदि फिर भी उसे सफलता नहीं मिलती तो वह उसे भाग्य का दोष नहीं वरन अपनी कार्यपद्धति का दोष मानता है।

सच तो यह है कि जो व्यक्ति भाग्य के भरोसे बैठा रहता है, उसका भाग्य भी बैठा रहता है और जो हिम्मत बाँधकर कार्य करता है उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है। भाग्य बना-बनाया नहीं मिलता है, वरन् उसका निर्माता तो हम स्वयं हैं। जैसा डिजरायली ने कहा है- We make our fortunes and call them fate. हम अपना भविष्य स्वयं बनाते हैं और उसे भाग्य कहते हैं।

ऐसा देखा गया है कि अविकसित व्यक्ति, परिवार या समाज भाग्यवाद जैसे दलदल में वर्षो से फँसा रहता है, जो इसके विकास के मार्ग अवरूद्ध होने का कारण है। ऐसे व्यक्ति, परिवार या समाज बडा जोखिम उठाने से कतराते हैं। इसलिए अभी तक इनमें अनेक प्रकार की कुरीतियाँ, अंधविश्वास, अंधभक्ति विद्यमान है। अत: भाग्य को भूलिये और उद्योगी बनिये। सफलता आपके कदमों को चूमेगी। आप अपने भाग्य का निर्माण स्वयं कर सकते हैं।

आजकल देश को आत्मनिर्भर बनाने पर बहुत जोर दिया जा रहा है।  ऐसा देखा गया है कि गरीब या विकासशील देश अपनी छोटी—छोटी जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहता है।  भारत भी इन्हीं देशों में से एक है।  लोगों को यह जानकर आश्चर्य एवं शर्म भी होगा कि पूजा—पाठ में उपयोग किये जाने वाले अगरबत्ती का हम लगभग 50 प्रतिशत दूसरे देशें से आयात करते हैं।  भला अगरबत्ती बनाने में किस रॉकेट साइंस का प्रयोग होता है।  हमारे यहाँ गरीब बेरोजगारों की भी कमी नहीं है, फिर अगरबत्ती जैसे सामान्य चीजों का आयात करना समझ से परे हैं। अन्वेषण के क्षेत्र में हम पीछे तो है हीं निर्माण के क्षेत्र में भी हम उदासीन हैं।  दूसरी बात जो सबसे प्रमुख कारण है हमारे यहाँ अंवेषण और निर्माण नहीं होने का वह है — बेईमानी या यूँ कहिये उद्योगपतियों का अत्यधिक लालची  होना।  जिसके कारण वे मानक उत्पाद नहीं बना पाते हैं।  हम कई देशें के उत्पादों को आँख मूँदकर खरीदते हैं, क्योंकि उस देश पर भरोसा करते हैं । अपने देश पर नहीं, क्योंकि अपने देश के ज्यादातर उत्पादों को खरीकर हम ठगा सा महसूस करते हैं।  वेसे तो भारत के वैज्ञानिकों एवं इंजीनियरों का दुनिया लोहा मानती है, लेकिन ये लोग भारत में भारत के लिए काम करने में सहज महसूस नहीं करते हैं।  सच है देशभक्ति के बिना आत्मनिर्भरता की कल्पना करना हास्यास्पद है।  जब उद्योगपतियों का उद्देश्य देश को लूटना होगा तो वे व्यापार करेगें। देश के आर्थिक विकास में सहयोग नहीं। जब देश के वैज्ञानिक , डॉक्टर, इंजीनियर एवं अन्य प्रोफेशनल शिक्षा के रूप में  देश के संसाधनों को दोहन कर रहे होते हैं तो वे असहज महसूस नहीं करते हैं।  तब उसे देश का सबकुछ ठीक लगता है ।  लेकिन जैसे ही उनका देश को वापस करने की बारी आती है तो सबकुछ प्रतिकूल लगता है। हरेक चीजों में वे मीन—मेख निकालते हैं।  इस तरह करोड़ों खर्च करने के बाद देश के लिए कुछ नही करेंगे तो देश आत्मनिर्भर कैसे हो सकता है? देश के कुछ उद्योगपति देश के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं तो दूसरी ओर ज्यादातर देश को लूटकर विदेश भागने के फिराक में रहते हैं।  हम कहते हैं कि अंग्रेज भारत को लूटकर चले गये, लेकिन अभी हम यह भी नहीं कह रहे हैं कि भारत के कुछ उद्योगपति भी भारत को लूट कर चले गये और कुछ लूट रहे हैं।  इस तरह की देशभक्ति अगर देश को प्रभावित करने वाले व्यक्ति करेंगे तो देश आत्मनिर्भर कैसे बनेगा?  ईमानदारी और देशभक्ति में चोली—दामन का संबंध है।  जहाँ के नागरिक इमानदार हैं वे देशभक्त भी हैं।  बेईमान व्यक्ति से आप देशभक्ति की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं। जापानी टेक्नोलोजी इसलिए मशहूर है कि वहाँ के नागरिक इमानदार हैं।  चूकि वे इमानदार हैं, इसलिए देशभक्त भी हैं।

देश आत्मनिर्भर सिर्फ भाषणों और नारों से नहीं बनेगा। देश आत्मनिर्भर बनेगा देश के प्रत्येक नागरिकों के इमानदारीपूर्वक दिये गये योगदान से । जब तक हमारे करनी और कथनी में अंतर रहेगा, तब तक हम कोई बड़ा लक्ष्य हासिल नहीं कर सकते हैं।

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s