शिक्षा के बिना विकास असंभव

आज हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं। दुनियाँ दिन दूनी रात चैगुनी प्रगति कर रही है। अनेक प्रकार के वैज्ञानिक आविष्कृत वस्तुएँ हमारी दैनिक जीवन को बेहद आसान एवं आनन्दमय बना दिया है। हजारों मील की दूरियाँ अब हम घंटों में तय कर लेते हैं। सात समुन्दर पार बैठे अपने स्वजनों से मिनटों में बात कर लेते हैं। हमने चाँद की यात्रा कर ली है, ओैर मंगल की खोज खबर ले ली है। पर इन सब के बावजूद एक दुखद सत्य यह भी है कि के आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी प्राथमिक शिक्षा से बंचित है। बिल्कुल निरक्षर, काला अक्षर भैंस बराबर। उनके बच्चे होश संभालते ही विद्यालय के बजाय खेत-खलिहान, दुकान-कारखानों की ओर भागते हैं। उनकी यह स्थिति पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।

अनेक विकसित देषों के सरकारों, स्वयंसेवी संगठनों का ध्यान इस ओर आकृष्ट हुआ है, वे प्रयास भी कर रहे हैं पर सफलता वही ढाक के तीन पात मिल रही है। अशिक्षा के मामले में भारत की स्थिति और भी विस्फोटक है। यहाँ की आबादी का एक तिहाई हिस्सा निरक्षर है। निशाद समाज की स्थिति चिंताजनक नहीं, बल्कि लज्जाजनक है। इस समाज में साक्षरों की संख्या बेहद कम है। उच्च शिक्षा प्राप्तकत्र्ताओं की संख्या उँगुली पर गिनने योग्य है। करोड़ों की संख्या में रहने के बावजूद इस समाज में प्रशासनिक अधिकारी या अन्य क्षेत्रों के अधिकारियों की संख्या नगण्य है। निषाद समाज के बारे में थोड़ी भी ज्ञान रखने बाले व्यक्ति अच्छी तरह जानते होगें कि प्राचीन काल में यह समाज शिक्षा के क्षेत्र में कितना आगे था I सभ्यता संस्कृति की नींव एवं रामायण, महाभारत जैसे महान धर्मग्रन्थ की रचना इसी समाज के महापुरूषों ने की थी। लेकिन आज स्थिति बिल्कुल विपरीत है। शिक्षा के क्षेत्र में हमारी स्थिति शर्मनाक है। सोचनीय बिन्दु यह है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ, और क्यों हो रहा है। हम अपने स्वर्णिम अतीत को भूलकर अंजान राह में क्यों भटक रहे हैं ? हमारे समाज में अज्ञानता, अंधविश्वास, दरिद्रता बढ़ता क्यों जा रहा है? इसका मूल कारण हमारे समाज में व्याप्त घोर निराशा है। हम अपने भाग्य को कोसते हैं। अपनी गलतियों का दोषारोपण दूसरों पर करते हैं। स्वयं एकलव्य न बनकर द्रोणाचार्यों को गाली देते हैं। अपने कल्याण के लिए स्वयं न सोचकर दूसरों से कुछ पाने की निरर्थक अपेक्षाएँ करते हैं। अब तो स्थिति अनुकूल है अगर आप एकलव्य बनेगें, तो स्वयं द्रोणाचार्य आपका अभिनन्दन करेंगे, न कि पुराने जमाने की तरह अंगुठा दान में मांगेंगे। तो फिर किस बात की चिंता है, कमी क्या है, क्या आज हमें एकलव्य से भी कम सुविधाएँ प्राप्त है? आज हमारी युवा पीढ़ी एकलव्य, वेदव्यास, बाल्मीकि और ध्रुव को अपना आदर्श न मानकर शराब के नशे में उस राह पर चल रहें हैं जो अंततः गत्र्त तक जाती है।

हमारे समाज के अधिककांश सदस्य नशें में दुख, गम, खुशियाँ और एकांकीपन विताते हैं। परिणामस्वरूप वे परिवार और समाज के प्रति लापरवाह होते जाते हैं। अपने आमदानी का बड़ा हिसा शराब पर ही व्यय कर देतें हैं। फलतः उसके पास बच्चों को खिलाने तक के पैसे नहीं बचते तो वे उन्हें शिक्षा कहाँ से दिला पाऐंगें। दूसरी सबसे घातक बिमारी जो इस समाज में फैली है जनसंख्या बृद्धि। इस समाज के अधिकांश सदस्य गरीब है, उनका सोचना है कि अधिक बच्चे होंगे तो वे बड़े होकर उनका दुख दरिद्रता दूर करेंगे। इसी ख्याल से लोग अधिक से अधिक बच्चे पैदा करते चले जाते हैं, फलतः बच्चे जब विद्यालय जाने लायक होता है तो उसक किसी काम पर लगा दिया जाता है। उन्हें प्राथमिक शिक्षा भी नसीब नहीं होता है। इस तरह पीढ़ी दर पीढ़ी यही सिलसिला चलते आ रहा है। परिणाम यह होता है कि अपनी स्थिति तो बिगारते ही हैं साथ ही साथ अपने बच्चे का भी भविष्य गर्क में डाल देते हैं।

अतः मैं अपने समाज के समाजसेवियों से निवेदन करता हूँ कि समाजोत्थान की प्रथम सोपान शिक्षा पर ध्यान दें। इसके बिना समाजोत्थान के बारे में सोचना हास्यास्पद है। अतः समाज के प्रत्येक साक्षर सदस्य कम से कम अपना परिवार और अड़ोस-पड़ोस के निरक्षरों को साक्षर बनाने के लिए कटिवद्ध हो जाएँ। साथ ही साथ अपने समाज से संबंधित इतिहास पत्र-पत्रिकाओं के बारे में लोगों को बतावें एवं उन्हें पढ़ायें ताकि उन्हें अपने गौरवशाली अतीत के बारें में जानकारी हो ओर वे खुद भी अपना विकास करने के लिए उचित मार्ग अपना सके। अगर ऐसा हुआ तो शीघ्र ही हमारा समाज सभ्य, सुशिक्षित एवं सुसंस्कृत समाज बन जायेगा।
संजय कुमार निषाद

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