सामाजिक विकास हेतु जनसंख्या बृद्धि रोका जाना अत्यन्त आवश्यक

पुराने जमाने में पुत्र को मोक्ष प्राप्ति के कारण माना जाता था। नि:पुत्र दम्पतियों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। ऐसी मान्यता थी कि पुत्रवान ही स्वर्गाधिकारी हो सकते हैं। उस समय पृथ्वी पर मानव की आबादी नाममात्र थी। मानव असंगठित थे। उन्हें अनेक प्रकार के समस्याओं से जूझना पड़ता था। कभी जानवरों से तो कभी अन्य समूहों के लोगों से उन्हें आत्मरक्षा हेतु लड़ना पड़ता था। जब मानव थोड़ा बुद्धिमान हुआ तो उन्हें भोजन इकट्ठा करने की चिंता सताने लगी, सोचने लगे अधिक लोग रहेंगे तो अधिक भोजन इकट्ठा होगा। उसके पश्चात जब आधुनिक सभ्यता संस्कृति की नींव पड़ी, तो समाज में वर्चस्व के लिए जनसंख्या बृद्धि उचित समझा। आज जनसंख्या वृद्धि या पुत्र प्राप्ति दुख का कारण माना जाता है। बहुत से लोगों के मुख से सुना गया है, इस पुत्र से तो अच्छा था हम निपुत्र ही रहते। आज अधिक संतान उत्पन्न करना निश्चय ही कलह का कारण है। एक एक बच्चे माँ—बाप एवं पृथ्वी पर बोझ बनते जा रहा है। प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। परिणामत: कभी भूकम्प तो कभी चक्रवात, आँधी तूफान, महामारी, अतिवृष्टि, अल्पवृष्टि या असाध्य रोगों द्वारा प्रकृति संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है, साथ—साथ मानव समुदाय का इस ओर ध्यान आकृष्ट कराने का प्रयास भी कर रही है। पर मानव अब मानव रहा कहाँ? इन्हें अब खुद की चिंता कहाँ है? आज चारों ओर भ्रष्टाचार, बेईमानी, चोरी, डकैती, हिंसा बढ़ रहा है। इसका मूल कारण अत्यधिक जनसंख्या ही तो है।

जनसंख्या में तीव्र वृद्धि प्राय: गरीब, अल्प विकसित या विकासशील देशों में होता है, क्योंकि यहाँ जन्मदर उच्च एवं मृत्युदर निम्न रहता है। भारत एक विकासशील देश है। इसकी जनसंख्या वृद्धिदर उच्च ही नहीं अपितु चिंतनीय है। विश्व के लगभग 2 प्रतिशत भू भाग भारत के पास है, लेकिन विश्व की 16 प्रतिशत जनसंख्या भारत में निवास करती है। भूभाग और जनसंख्या के बीच यह असंतुलन अत्यधिक चिंताजनक है। भारत की जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा निषादों का है। विभिन्न उपजाति, गौत्र, कुरी में विभाजित रहने के कारण यह अल्पसंख्यक प्रतीत होता है, परंतु सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है। संपूर्ण भारत में निषादों की संख्या कुल जनसंख्या का पाँचवा हिस्सा है, फिर भी देश की मुख्य धारा से अलग है। इसका न तो राजनैतिक पहचान है न आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक पहचान है।

विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर निषादों का ऐसी दुर्दशा क्यों है? प्राचीन काल का समृद्ध गौरवशाली समाज आज पशुवत जीवन निर्वाह क्यों कर रहा है? आखिर विकास की किरणें इनके झोपड़ियों ते क्यों नहीं पहुँच पायी? सरकार एवं स्वयंसेवी संगठन इनकों उपेक्षा भरी नजरों से क्यों देखती है? इन सारे सबालों का एक ही जबाव मिलता है— निषादों की अनियंत्रित जनसंख्या ही इनके चतुर्मखी विकास के मार्ग में बाधक है। जब तक हम स्वयं अपना विकास करना नहीं चाहेंगे, तबतक कोई हमारी लाख मदद करे हमारा विकास नहीं होगा। भारत की आर्थिक हालत को बेहतर नहीं कहा जा सकता है, इस स्थिति में अगर सरकार सिर्फ निषादों की मदद करना चाहें तो उनके लिए एक दुष्कर कार्य होगा। अगर सरकार हमारी मदद भी कर दे तो हम कहाँ तक अपना विकास कर पायेंगे? सरकार हमें व्यापार करने कर्ज देगी ओैर हम उस कर्ज के रूपयों को शराब पीने, जुआ खेलने में बरबाद कर देगे तो हमारा कल्याण कैसे होगा?

अत: हमें खुद अपना विकास के लिए सोचना पड़ेगा। अगर हम पाँच छ: बच्चों का समुचित लालन—पालन एवं उचित शिक्षा नहीं दिला पाते तो इतने बच्चे उत्पन्न करने से क्या फायदा? अगर हमें एक या दो बच्चें रहेगें तो उसे हम मेहनत मजदूरी करके भी उचित शिक्षा दिला सकते हैं। कम बच्चें रहने पर परिवार पर अत्यधिक आर्थिक बोझ नहीं होगा, फलत: परविार के मुखिया की मानसिक स्थिति अच्छी रहेगी जो उन्हें मद्यपान से बंचित रखेगा। अक्सर देखा गया है कि अधिकांश अभिभावक गृह कलह से उबकर मद्यपान करते हैं, इससे उन्हें तात्कालिक तनाव से मुक्ति मिल जाती है, जो सर्वथा अनुचित है। परिवार में कम बच्चें रहने पर उन्हें सबका अत्यधिक लाड़—प्यार मिलता है। सब प्रसन्नचित रहते हैं।

अक्सर कुछ लोग पुत्र की चाह में पाँच— छ: पुत्रियाँ उत्पन्न कर देते हैं, जबकि एसेा नहीं चाहते हैं। इसका मूल कारण दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव है। पुत्र की चाह में एक के बाद एक पुत्रियाँ का हम भविष्य अंधकारमय बना रहें हैं। यह हमारी विकृत मानसिकता का प्रमाण नहीं तो और क्या है? इस मँहगे समय में एक दो पुत्रियाँ का विवाह तो अभिभावक के कमर तोड़ देती है, फिर वे पाँच— छ: का विवाह कैसे कर पायेंगे? किसी को शराबी के साथ, तो किसी को बूढ़े के साथ भेज देंगे। बेचारी उम्रभर अपने भाग्य को कोसेगी, नेत्रों के जलकणों को छिपकर आँचल के पल्लू से पोछेगी। यह कैसा न्याय है माँ—बाप पुत्र के लिए पुत्रियों को नरक क्यों भेज देते हैं? इस राक्षसी मनोवृति को त्यागकर अगर पुत्र—पुत्री के भेदभाव को मिटा दें। पुत्रियों को अगर पढ़ा—लिखाकर योग्य बनायो जाये तो क्यो वे पुत्रों से रहेगी?

संजय कुमार निषाद

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