व्यक्तिगत विकास के द्वारा ही समाज का विकास संभव है।

आजकल सोशल मिडिया, सामाजिक संगठनों और राजनैतिक पार्टियों इत्यादि जैसे मंचों से अपने समाज के बुद्धिजीवियों, समाजसेवकों एवं राजनेताओं के द्वारा अपने समाज के विकास हेतु समाज में एकता लाने का प्रयास लगातार किये जा रहे हैं। जहाँ तक मेरी जानकारी में है, इस तरह के प्रयास चार दशक पहले से ही हो रहा है, और हमारा निषाद समाज आज भी सबसे नीचले पायदान पर है। समय के साथ जो परिवर्तन यानि विकास होता है बिल्कुल उससे भी अछूता। इसका कारण हमारे समाजसेवी बुद्धिजीवियों द्वारा जो दिया जा रहा है और जिस निदान पर अमल करने को कहा जा रहा है, मुझे लगता है शायद वह उचित नहीं है। अन्यथा समाज की जो आज स्थिति है, कम से कम वैसी नहीं होनी चाहिए जैसी है। जो प्रयास अब भी किया जा रहा है अगर इससे समाज का विकास हो सकता तो अब तक में हो जाता। 


हिन्दी के एक कहावत से हमलोग भलीभाँति परिचित हैं— पहले योग्य बनो फिर इच्छा। हमारे समाज के बंधु इच्छा पहले करते हैं योग्य तो बनना चाहते ही नहीं। आज चारों ओर आरक्षण का शोर है। लोग अपने तरह से इसे परिभाषित भी कर रहे हैं। हमें ये मिलना चाहिए, तो हमें इतना मिलना चाहिए, हमारे पूर्वज राजा थे, हमें राजपाट मिलना चाहिए, वे विदेशी हैं, अमुक हमारा हक मार रहा है, इत्यादि। कथन सभी सही हैं। मैं आरक्षण के खिलाफ नहीं हूँ। वर्तमान परिस्थिति में आरक्षण सामाजिक रूप से पिछड़ों के लिए जीवनदायिनी का काम कर रही है। लेकिन क्या सिर्फ आरक्षण काफी है, इससे हमारा कल्याण हो जायेगा? छात्र जीवन में मेरे कुछ स्वजातीय मित्र हुआ करते थे। उनमें से कुछ आर्थिक रूप से सबल भी थे, लेकिन विश्वविद्यालय के बाद सबने मेरा साथ छोड़ दिया। प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए मेहनत करना किसी के बस में नहीं था। अब भी हमारे समाज के बच्चों /युवाओं का यही हाल है। पृथ्वी पर जीवन के किसी भी क्षेत्र में बिना प्रतियोगिता किये कोई बेहतर जीवन नहीं जी सकता, यह कटु सत्य है। जितने पदों के लिए प्रतियोगिता होती है, उतने भी ऐसे प्रतियोगी हमारे निषाद कश्यप समाज से नहीं होते हैं जो ढंग से तैयारी करके परीक्षा दे रहा हो । उसे शत—प्रतिशत आरक्षण चाहिए, और यही सपना देखते आ रहे हैं, दिखाते आ रहा हैं और अब भी दिखाया जा रहा है। मजदूर का बेटा, किसान का बेटा, रिक्शाचालक का बेटा, ओटोचालक का बेटा, घर—घर में खाने बनानेवाली नौकरानी का बेटा आई0ए0एस0 बन चुका है। हमारे निषाद समाज के राजपुत्र अब भी इंतजार कर रहा है शत—प्रतिशत आरक्षण का।

       
समाज के कुछ राजनेता सह समाजसेवी अपने आप को मुख्यमंत्री एवं राष्ट्रपति तक के उम्मीदवार घोषित कर चुके हैं। यह अच्छी बात है, लेकिन पद के अनुरूप गुण और आचरण भी होना आवश्यक है। जब सोशल मीडिया जहाँ सिर्फ शिक्षित लोगों का आशियाना होता है, ढंग से बात नहीं करते तो समाज का सेवा या उच्च पद का अधिकारी कैसे हो सकते हैं। किसी के लिए भी अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले मानसिक रूप से कमजोर ही होता है और इससे साहस का काम नहीं हो सकता। नकारात्मक दिशा में किया गया कोई भी प्रयोग अनुपयोगी ही होता है। नकारात्मक बातें कर भीड़ तो इकट्ठा किया जा सकता है, लेकिन वह भीड़ भेड़ समान होगा। नकारात्मक बातें कर हम मन की भड़ास तो निकाल सकते हैं, लेकिन उससे बाते करने वाले ओैर सुनने वाले दोनों के सिर्फ उर्जा का ह्रास होगा। परिणाम भी नकारात्मक ही होगा। हमें इतिहास इसलिए नहीं पढ़ाया जाता है कि हम कुछ लोगों से बैर करें, अनावश्यकरूप से लड़े। बल्कि इतिहास पढ़ाने का मतलब होता है कि हम अपनी एवं दूसरों की पुरानी गलतियों से सबक लें और भविष्य में सतर्क रहें। अगर हम मानसिक, बौद्धिक, शारीरिक कमजोरियों के बजह से पुराने समय में अपना कुछ गवाँ दिये तो कम से कम आज इस तरह की गलतियों को नहीं दोहरायें। 
हम आज लोगों को पढा रहे हैं। हमारे पूर्वज राजा थे हम अपना राज—पाट लेकर रहेगे। हम अपनी गलतियों को उजागार नहीं कर रहें हैं बल्कि वही गलतियों को दोहरा रहे हैं। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि सत्ता की मांग करना जायज नहीं है, लेकिन सिर्फ राजनैतिक सत्ता से हम शासन नहीं कर पायेंगे। शासन के तीन अंग हैं— अपने देश में —व्यवस्थापिकाख, कार्यपालिका और न्यायपालिका। जबतक कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में हमारी हिस्सेदारी नहीं होगी हम शासन नहीं कर पायेंगे। इन दोनें में हिस्सेदारी के लिए हमें पढ़ना पड़ेगा और प्रतियोगिता भी करना पड़ेगा। इसलिए जो मुख्यमंत्री बनने के प्रयत्नशील हैं हमें उनका सहयोग तो करना ही चाहिए, लेकिन साथ में हमें शासन की बाकी दोनों अंगों के लिए भी तैयारी करना चाहिए। हमारे समाज के कुछ सफल राजनेता चाहे वे किसी भी पार्टी में जो समाज के लिए अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते हैं यह सच हैं और भविष्य में दे भी नहीं पायेंगे यह भी सत्य है, क्योंकि जब तक कार्यपालिका एवं न्यायपालिका में हमारे समाज के प्रतिनिधि नहीं होगें तब तक समाज का शोषण होता रहेगा। कार्यपालिका और न्यायपालिकाओं में हमारा प्रतिनिधित्व व्यक्तिगत प्रयास से ही संभव हो सकता है सामूहिक प्रयास से नहीं। 

मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि अगर आप परिवार का विकास करना चाहते हैं तो सबसे पहले स्वयं का विकास किजिये और अगर समाज का विकास करना चाहते हैं तो सबसे पहले अपने परिवार का विकास किजिये। सोशल मिडिया का सदुपयोग भी हमलोग कर सकते हैं। यहाँ अनेक प्रकार से सेवा एवं व्यवसाय से जुड़े अपने सामाजिक बंधु हैं और युवाओं की संख्या भी कम नहीं हैं। अगर हम एक—दुसरे के लिए अभद्र भाषा या नींचा दिखाने का प्रयास नहीं कर इसका प्रयोग सिर्फ जान—पहचान एवं ज्ञान का आदन—प्रदान करने के लिए करने तो समाज का कायाकल्प हो सकता है। 

हो सकता है मेरे इस विचार से कुछ लोग सहमत नहीं हो या उन्हें आघात लगा हो, लेकिन मेरी मंशा किसी को ठेस पहुँचाना नहीं है। समाज का विकास अगर पुराने विचारों एवं प्रयोगों से नहीं हो रहा है, तो कुछ नया करने में क्या बुराई है। अगर हम साकारात्मक दिशा में सोचेंगे तो परिणाम भी सकारात्म होगा। इसके विपरीत भी यही होता है। हमें सफलता के लिए सफल लोगों का अनुसरण करना चाहिए। सफल लोगों से बैर कर हम अपनी उर्जा का क्षय करते हैं परिणामस्वरूप हम असफल हो जाते हैं।

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