युवा जोश दिखायें।

युवा जोश अथवा शक्ति का खान होता है।  असंभव सा दीखनेवाला कार्य युवाओं के जोश में पलभर में सम्पादित हो जाता है।  दुनिया के महान से महान कार्य युवाओं द्वारा ही किया गया है।  सच तो यह है कि युवाओं के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।  हिमालय की उच्चतम चोटी पर ध्वज फहराना हो समुद्री मार्ग द्वारा विश्व भ्रमण करना हो, बर्फीले ध्रुवों पर पहुॅंचना हो, पहाड़ जंगल साफ कर रास्ता बनाना हो जैसे अनेकानेक कार्य करने में युवा अपना कदम वापस नहीं मोड़ता है।

सदियों से परतंत्र अनेक देशें के युवाओं में जब स्वाभिमान जागा, परतंत्रता के प्रति नफरत हुई।  वे अपने देश को स्वतंत्र कराने हेतु प्रण किये और अंतिम सांस तक लड़ते रहे।  आखिर कामयावी हासिल कर ही दम लिये।  सच तो यह है कि परिवार समाज एवं राष्ट्र की सारी जिम्मेदारियॉं युवाओं पर ही होता है।  युवा अगर संकल्प कर ले तो दुनिया का कोई भी काम उनके लिए असंभव नहीं होगा।  महाभारत में एक कथा है—निषाद राजकुमार एकलव्य की ।  गुरू द्रोणाचार्य कौरव—पॉंडव सहित कुछ अन्य राजकुमारों को शिक्षा देते थे।  यह देख एकलव्य को भी लालशा हुई कि हम भी गुरू द्रोणाचार्य के अन्य शिष्यों के भांति शस्त्र विद्या सीखें।  वे नम्रतापूर्वक गुरू द्रोणाचार्य से अपनी इच्छा जाहिर किये।  द्रोणाचार्य एकलव्य के परिचय लेने के पश्चात दो टूक शब्दों में बोले— मैं नीच जाति को शिक्षा नहीं दे सकता हॅूं।  फिर भी एकलव्य निराश नहीं हुए।  कहा जाता है कि गुरू द्रोणाचार्य की प्रतिमा स्थापित कर उनके समक्ष ही धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगे।  आगे चलकर वे उस समय के सर्वश्रेष्ठ धनुर्घर हो गये।  अत: हम कह सकत हैं कि अगर हममें जोश है कुछ कर दिखाने की तमन्ना है तो विपरीत परिस्थितियॉं कदापि बाधक नहीं बन सकती।  बाधाओं के भय से अगर हम कार्य की शुरूआत नहीं करते हैं तो यह हमारी कायरता है।  निर्वलता का प्रमाण हैं  बाधाएॅं उन कांटों की की भांति है जिसके बिना पुष्प की अपेक्षा सर्वस्था हास्यास्पद होगी।  अत: हमें बाधॉंए रूपी कॉटों को पार कर पुष्प समान सुगंधित एवं सुंदर जीवन प्रापत करना है।

हममें अपार शक्ति है। जरूरत हे, उसका सदुपयोग करने का।  जब हम अपनी शक्ति का सदुपयोग करेंगे तो हमारी शक्ति दिनों—दिन बढ़ती ही चली जायेगी।  हमारा जोश, उत्साह, उत्कंठा बढ़ता ही चला जायेगा।  हम एक—से—एक लोकोपकारी कार्य करते चलेगें, एक समय ऐसा आयेगा कि अगर हम पीछे मुड़कर अपनी ही कार्यो का विश्लेषण करेंगे तो विश्वास नहीं होगा कि इतना कार्य करने की क्षमता हममें थी।  लेकिन इसके विपरीत अगर हम अपने शक्ति का दुरूपयोग करने लगे तो हमारी शक्ति क्षीण्ण होती जायेगी।  हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो जायेगी।  हमारी क्षमता सीमित हो जायेगी।  हम सिर्फ एक कार पायेगे, दूसरों को कष्ट पहुॅंचना, चाहे वह जिस तरीके से हो अत: हमारी अंत अत्यन्त दयनीय तरीके से होगी।  अत: हमें अपनी शक्ति के दुरूपयोग करने से बचना चाहिए।

आज सम्पूर्ण विश्व में हलचल है, कोलाहल है, अशांति है, अराजकता है, आखिर इसका कारण क्या है?  ऐसा क्यों हो रहा है?  इसका मूल कारण है युवा वर्ग का अपने कर्तव्यों से विमुख होना।  युवावस्ािा को अपनी जिंदगी से अलग मानना।  इस अवस्था का काम सिर्फ खाना—पीना और मौजमस्ती करना ही समझना।  धर्म, साहित्य एवं सेवा से युवा वर्ग जिस प्रकार दूर होता जा रहा है।  इससे भवष्य में और बड़ा संकट उत्पन्न हो सकता हैै।  धर्म में जो विसंगतियॉं उत्पन्न हो रही है या हुई है, पाखंड, अंधविश्वास, अंधभक्ति, कुरीतियॉं का प्रचलन हुआ है या हो रहा है इसका कारण क्या है?  युवा सोचते हैं या आजकल मानते हैं धर्म,पूजा—पाठ या सत्संग उनके हिस्से की चीज नहीं है।एक तो वे पढ़े लिखे समझदार लोग हैं, दूसरा यह काम बूढ़े—बुजर्गों का है।  ऐसे में धर्म का संशोधन कैसे होगा?  धर्म में जब तक आधुनिक समस्या एवं तर्क का समावेश नहीं होगा तब तक समग्र मानव समुदाय का विकास संभव नहीं हैं।  जैसे हमारी धार्मिक मानरूता है कि अंतकाल में पुत्र द्वारा ही मुखांग्नि देने से ही मोक्ष अथवा स्वर्ग की प्राप्ति हो सकता है।  इसी कारण लोग पुत्र की चाह में दर्जनों पुत्रियॉं उत्पन्न कर देते हैं।  इस प्रकार के अनेक मानयताएॅं है जो सदियों पूर्व उस समय के आवश्यकता अनुरूप या अन्य किसी प्रयोजन के फलस्वरूप प्रचलित हुई।  दुर्भाग्य आज तक प्रचलन में हैं, कारण युवा इससे सतर्क नहीं हुए।

आत्मशुद्धि के लिए पूजा—पाठ एवं संस्कार यज्ञ अतिआवश्यक है।  इसका यह मतलब कतई नही है कि हम धर्म के नाम पर मूढ़ मान्यताओं को ढोते रहे।  धर्म में सिर्फ अंधविश्वाास, अंधभक्ति, कुप्रथाओं, मूढ़—मान्यताओं का समावेश नहीं है, वरण उनमें सब कुछ है जिसकी हम अपेक्षा करते हैं।  युवाओं को धर्म के महत्व को समझने की  आवश्यकता है, जिससे समाज में व्याप्त व्यभिचार, भ्रष्टाचार का नाश हो सके और धर्म का परिष्कृत रूप भी सामने अस सके।

क्रांति और साहित्य में चोली दामन का संबंध हैं  साहित्य के बिना किसी भी प्रकार की क्रांति की कल्पना करना निरर्थक है।  समाज का वास्तविक नेतृत्व साहित्य के द्वारा ही होता है ।  भोजन से शारीरिक विकास होता है पर साहितय से बौद्धिक विाकस होता है।  आज जिस प्रकार का साहित्य रचा जा रहा है, खासकर युवा वर्ग द्वारा जिस प्रकार का साहित्य पढ़ा जा रहा है, उससे बौद्धिक विकास के बजाय बौद्धिक ह्रास ही होता है।  धन के लोभ में सेक्स, हिंसा, अत्याचार, मराकाट जैसे विषयों पर रचा गया आकर्षक, अश्लील साहित्य युवाओं को पथभ्रष्ट करने के अलावा, स्वार्थी, कामुक, धन लोलुप, कायर, कामचोर भी उपहार स्वरूप बनाता है।  अच्छे साहित्य के रचचिता सड़क पर मूंगफली बेचते नजर आते हैं, अश्लील साहित्य के निर्माता महलों में ऐश करते हैं।  आज विश्व के अधिकांश देश भ्रष्टाचार के आगोश में डूबा है।

भारत की स्थिति किसी से छिपा नही है।  युवा वर्ग में नेतृत्व करने की क्षमता नहीं हैं  आखिर क्यों?  युवावर्ग अपने को समाज के देश के क्रिया कलापों से दूर रखता है।  अत: समाज, देश के उज्जवल भविष्य के लिए युवाओं में सत्साहित्य का प्रचार—प्रसार अत्यन्तावश्यक है।  अगर समय रहते हुए इस ओर ध्यान नहीं दिया गया ‘अश्लील साहित्य के प्रकाशन,वितरण एवं प्रचलन पर रोक नहीं लगाया गया, कामशास्त्र के नाम पर कामात्तेजक साहित्य, विषयों पर संगोष्ठी सभाओं या अन्य माध्यमों पर रोक नहीं लगाया गया और बच्चे युवाओं के लिए समान्य पाठ्यक्रम के साथ—साथ अच्छे साहित्य के पठन—पाठन की व्यवस्था नहीं किया गया तो एक समय ऐसा आयेगा कि मानव एवं पशु के मध्य अंतर समाप्त हो जायेगा।  मानवता का लोप हो जायेगा।  आधुनिक सभ्यता जो पश्चिमी सभ्यता का प्रतिरूप है, के नाम पर जो नग्नता एवं उच्छंखलता का प्रचलन आज हमारे समाज में बढ़ रहा है।  वर्तान के लिए चिंतनीय विषय एवं भविष्य के लिए यह उत्यन्त खतरनाक हो सकता है।


सेवा वह कड़ी है जो एक मानव को दूसरे मानव , जीव—जंतु से जोड़ती है।  सेवा के अभाव में समाज तो क्या!परिवार भी सुचारू रूप से नहीं चल सकता है।  सेवा भावना के अभाव में पति—पत्नी के बीच, पिता—पुत्र, मॉं—बेटी, सास—बहु जैसे अटूट एवं अत्यंत निकटम रिश्ते में भी कटुता आ जाती है।  आज के युवाओं में सेवा भावना का अत्यंन्त अभाव है।  फलस्वरूप परविार, समाज एवं देश में मानवता का ह्रास हो रहा है।  सेवा भावना के अभाव के कारण ही आज के राजनेता देश सेवक के बजाये देशद्रोही जैसा कार्य कर रहे हैं।  वे अपनी मान—मर्यादा देश की चिंता किये बगैर निजि स्वार्थ के खातिर कुछ भ करने को तैयार जो जाते हैं।

अनेक विकसित देशें में बृद्धाश्रम का प्रचलन बहुत पहले से है।  वृद्धाश्रम का संचालन सरकार द्वारा होता है।  वहॉं के वृद्धों के देखीााल का जिम्मा परिवार के बजाय सरकार पर होता है।  सीधे तौर पर देखने पर यह एक अच्छी परंपरा या नियम या चलन दिख्ता है।  पर गहराई से सोचने पर यह एक चिंतनीय विषय मालूम पड़ता है।  आजकल भारत में भी वृद्धाश्रम की प्रथा अपनी प्रारंभिक दौर से गुजर रही हैं  आगे क्या होता है? भगवान जाने!  फिलहाल यह काफी चिंतनीय विषय है, समय रहते ही युवाअेां को सॅंभलना होगा। उन्हें आगे आना होगा।
संजय कुमार निषाद

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