सफलता (Success)

मानव के लिए आज भी भाग्य एक गूढ़ रहस्य बना हुआ है।  चाहे शिक्षित हो या अशिक्षित, भाग्य को एकदम नकारने वाले विरले ही मिलेंगे।  अगर को सफलता मिली तो लोग कहेंगे भाग्य अच्छा था।  इसके विपरीत अगर कोई असफल हो गया तो भी लोग कहेंगे भाग्य में नहीं लिखा था या उसके भाग्य का ही दोष है इत्यादि। तो क्या वास्तव में भाग्य मानव के जीवन को निर्धारित करता है?  मानवीय क्रियाएॅं उनका उत्थान पतन भाग्य द्वारा संचालित होता है?  अगर हम भाग्यवादी हो भी जायें अर्थात भाग्य को मान लें तो क्या ईश्वर अपने संतानों के साथ भेदभाव करते हैं?  अर्थात किसी को सफलता देकर सारी दुनियॉं की ऐश्वर्य उसे दे देते हैं तो किसी को प्रत्येक पग पर असफलता देते हैं।

दरअसल भाग्य मानव का कल्पनामात्र हैं  ठसे इतना प्रचारित प्रसारित किया गया है कि लोग इसे सत्य मानने लगे हैं।  इम अगर भाग्य को वास्तविक न मानकर काल्पनिक मान लें तो सफलता के अन्य साधनों के विषय में सोच सकते हैं।  हलांकि विश्व के सभी धर्मों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कर्म की प्रधानता दी गई है,  लेकिन भाग्यवाद का जन्म भी कहीं न कहीं धार्मिक कारणों से ही हुई है।  इसके पीछे आरंभ में किसी का स्वार्थ हो सकता है लेकिन आज के इस आधुनिक युग में भी भाग्यवाद का फलना—फूलना कहीं —न—कहीं संपूर्ण मानव समाज पर प्रश्नचिह्न है।

अगर हम अपने भाग्य को अच्छा मानते हैं तो जाने—अनजाने में हमारी सोच सकारात्मक हो जाती है।  हमारा अवचेतन मन के सकारात्मक सोच को परिणाम में लाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।  अंतत: हम अच्छे परिणाम पाते हैं।  इसके विपरीत भी बुरे परिणाम देते हैं।  अपने भाग्य को कोसनेवाला कभी सकारात्मक नहीं सोच पाता है वे जब भी सोचेंगे तो अपने दुख—दर्द एवं नकारात्म ही सोचेंगे।  इसका अवचेतन मन द्वारा दुख या नकारात्मक परिणाम ही तैयार किया जाता है।

सफलता के लिए कठिन परिश्रम करना आवश्यक है एसेा भी कुछ लोगों का मानना है।  कुछ हद तक यह ठीक भी है।  हमें सफलता के लिए कठिन परिश्रम करना चाहिए लेकिन यह हमारे लक्ष्य पर निर्भर करता है।  अगर हमारा लक्ष्य बहुत बड़ा है तो यह फार्मूला काम नहीं करेगा।  कठिन परिश्रम से हम एक साधारण लक्ष्य प्राप्त कर सकत हैं।  क्योंकि हमारे काम करने के समय को एक सीमा तक ही बढ़ा सकते हैं।  अगर हमारा लक्ष्य बहुत बड़ा है तो हमें कठिन परिश्रम से अगला कदम कम से कम परिश्रम जी हॉं कम से कम परिश्रम पर काम करना पड़ेगा।  ध्यान दे एक मजदूर केवल एक कारखाना में काम कर सकता है, लेकिन एक मालिक के पास एक या अनेक कारखाना भी हो सकता है।  यह संभव है कि वे इनमें से किसी भी कारखाने में कोई काम नहीं करते हो। यानि शुरूआत में आपको सफलता के लिए कठिन परिश्रम तो करना ही पड़ेगा , लेकिन उसके बाद अगर और आगे बढ़ना हो तो कम से कम परिश्रम (Least Work) के रास्ते तालाश करना पड़ेगा।

संजय कुमार निषाद

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