क्या हम वास्तव में विश्वगुरू थे ?

जब कोई व्यक्ति अपना परिचय में अपने पूर्वजों का वखान कर रहा है तो समझ जाइये उसका अभी दुर्दिन चल रहा है। लोग भूतकाल के सुनहरें दिनों को तभी याद करते हैं जब उनका वर्तमान खराब हो। भला वर्तमान में मजे करने वाले भूतकाल में किये गये मजे को क्यों याद करेगें। एक करोड़पति को यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि उनके दादे-परदादे करोड़पति थे। अगर होगें भी तो उनका परिचय देने की उनको कभी आवश्यकता नहीं होती है। उसी प्रकार एक ज्ञानी को अपना परिचय देने में कभी अपने पुरखों के ज्ञान की वखान करने की आवश्यकता नहीं होती है। अगर कोई खुद के बारें में ही कहें कि वे कभी बलिष्ठ हुआ करता था। मतलब साफ है आजकल वह मजबूत नहीं है। अगर आप यह कहते हैं कि भारत भूतकाल में समृद्ध था तो मतलब अभी गरीब है। हम अगर बार-बार यह दोहराते हैं कि हम विश्वगुरू थे तो इसका मतलब है कि हम आजकल विश्वगुरू तो क्या अच्छे शिष्य भी नहीं रहे। भूतकाल की यादें और भविष्य के सुनहरे सपने देखने वाले वास्तव में असफल और कमजोर मानसिकता वाले होते हैं। सफल और मजबूत मानसिकता वाले व्यक्ति वर्तमान के महत्व को समझते हैं और आज को सुधारने, सँवारने के लिए कार्य करते हैं। इस नियम से अगर हम यह कह रहे हैं कि हम कभी विश्वगुरू थे, तो इसका मतलब साफ है कि आजकल हम वास्तव में ज्ञान से वंचित है। हम भविश्य में भारत को विश्वगुरू बनाना चाहते हैं, मतलब साफ है कि हम अभी कुछ नहीं करने जा रहे हैं। हम कोई कार्य भविष्य में क्यों करेंगे? आज क्यों नहीं?
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अगर हम भूतकाल या भविष्यतकाल के बारें में चर्चा या बातें करेगें तो निश्चित ही यह हमारी प्रगति में बााधक साबित होगी। भूत की चर्चा वर्तमान खराब होने पर ही की जाती है। उसी तरह भविष्य का चिंतन करने से बेहतर है कि वर्तमान में कुछ कार्य किया जाए भविष्य सुघारने के लिए।

अपने को विश्वगुरू समझनेवाले को यह सोचना चाहिए कि जिस पश्चिमी सभ्यता को हम अपने से निम्नतर समझने का भ्रम दशकों से पाल रखें हैं। उस सभ्यता में हजारों खूबियाँ थी और है भी । जब हमारे यहाँ गुरूजी सिखाया करते थे कि श्रुद्रों और अछूतों को ज्ञानार्जन का अधिकार नहीं है। इसलिए इसे शिक्षा से विमुख रखा जाए ताकि ये पशुवत जीवन गुजारकर कुछ श्रेष्ठ मानवों की सेवा कर सके। वहीं उसी समय पश्चात्य सभ्यतावाले सकारात्मक सोच की शक्ति के बारे में आमजनों को सिखा रहे थे, ताकि वे आत्मबल में बृद्धिकर जीवन में उत्तरोत्तर प्रगति के मार्ग पर बढ़ सके। समस्त मानव का कल्याण सोचने वाले वास्तव में हमारी सभ्यता के हिसाब से गुरू नहीं हो सकते हैं। गुरू तो वैसे भी हमारे यहाँ तो होते कहाँ थे? किंदवतियों से तो यह साफ झलकता है कि हमारे यहाँ प्राइवेट ट्यूटर हुआ करते थे, जो एक गाय के बदले अधर्म का साथ दे सकते थे या लालच के खातिर किसी का अंगूठा कटवा सकते थे। वैसे प्राइवेट ट्युटर के बल पर हम विश्वगुरू थे और फिर से बनने को सपना देख रहे हैं तो इसे खयाली पुलाव नहीं तो और क्या कहा जायेगा।

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