Book Review: As a man thinketh

As a man thinketh जेम्स एलन की कालजयी कृति है। जेम्स एलन ब्रिटेन के दार्शनिक लेखक थे। एज ए मैन थिन्केथ 1902 ई0 में प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तक अनेक समकालीन लेखकों को तो प्रभावित किया ही साथ ही साथ सेल्फ हेल्प जैसे विचारों को मानने वाले लेखकों के लिए भी यह पुस्तक आज भी प्रेरणा का स्रोत रही है। लेखक इस पुस्तक को लिटिल वाल्युम कहते थे, जिसका अनुवाद कई भाषाओं में हुआ है और करोड़ों पाठक अब तक इसे पढ़ चुके हैं। लेखक का मानना है कि केवल विचार शक्ति के द्वारा ही मनुष्य अपने विजन यानि अपने स्वप्न को वास्तिविकता में बदल सकते हैं। मनुष्य स्वयं ही स्वयं के निर्माता हैं। मन के द्वारा वे ज्ञानोदय यानि ज्ञान में बृद्धि ओर सुख—शान्ति का निर्माण कर सकते हैं।

इस छोटी सी पुस्तक के कुल सात चैप्टर इस प्रकार हैं:
1. Thought and Character यानि विचार और चरित्र
2. Effect of thought on circumstances यानि परिस्थितियों पर विचार का प्रभाव
3. Effect of thought on health and body यानि विचार का स्वास्थ्य और शरीर पर प्रभाव
4. Thought and purpose यानि विचार और उद्देश्य
5. The thought-factor in achievement यानि उपलब्धि में विचार—तत्व
6. Visions and ideals यानि परिकल्पानाएँ और आदर्श
7. Serenity यानि प्रशांति

अध्याय एक
Thought and Character (विचार और चरित्र)

इस अध्याय में लेखक ने एक प्रसिद्ध कहावत मनुष्य अपने दिल में जैसा सोचता है वैसा ही होता है की व्यापकता की व्याख्या किया है। लेखक का कहना है कि मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही बन जाता है एवं उनका चरित्र उसके तमाम विचारों का ही योगफल है। जैसे बीज के बिना पेड़ नहीं उग सकता, उसी तरह मनुष्य द्वारा सोच समझकर किये गये कार्य या बिना सोचे किये गये कार्य के पीछे अप्रत्यक्ष रूप में विचार रूपी बीज होता है, जिसके बिना किसी कार्य का होना असंभव है। विचार का पुष्पित होना कार्य है, सुख और दुख उसके फल हैं।

मन में निहित विचार ने हमें बनाया है, हम जो भी हैं, वह अपने विचारों द्वारा गढ़े और बनाये गये हैं। यदि मनुष्य के मन में बुरे विचार हैं तो उसके पास दुख अवश्य आता है। यदि मनुष्य विचारों की पवित्रता बनाये रखे, तो निश्चय ही प्रसन्नता उसका पीछा परछाई की भांति करेगी।

जेम्स एलन का कहना है कि महान एवं ईश्वर के बराबर का चरित्र कोई संयोग या कृपा से प्राप्त गुण नहीं है। मनुष्य प्राकृतिक तरीकों से बढ़ता है। सही विचारधारा की ओर निरंतर किये गये प्रयास से और अच्छे विचारों से संबंध बनाये ररखने से मनुष्य महान बनता है। इसी तरह पाश्विक चरित्र भी अधम यानि नीच विचारों को निरंतर अपने मन में बनाये रखने का परिणाम है। शक्ति बुद्धि और प्रेम से युक्त जीव होने और अपने विचारों के मालिक होने के कारण मनुष्य के पास हर परिस्थितियों की कुजी यानि चाबी है। स्वयं उसके भीतर परिवर्तित यानि बदलने तथा पुनर्जीवन देने वाले साधन भी है, जिससे वह जो चाहे बन सकता है।

केवल कठिन परिश्रम और गहराई तक खुदाई करने के बाद ही सोना और हीरे पाये जा सकते हैं, उसी तरह अपनी अंतरात्मा रूपी खदान में गहराई तक जाकर खोजने पर ही मनुष्य अपने अस्तित्व से संबंधित हर सत्य को पा सकता है। जो खोजता है वही पाता है, और जो खटखटाता है द्वार उसी के लिए खुलता है। केवल धैर्य, अभ्यास और बिना थके निरंतर आग्रह से ही मनुष्य ज्ञानरूपी मंदिर के द्वार में प्रवेश पा सकता है।

अध्याय दो
Effect of thought on circumstances ( परिस्थितियों पर विचार का प्रभाव)

जेम्स ऐलन कहते हैं कि मनुष्य का मन एक उपवन के समान है, जिसे समझदारी से सजाया सँवारा जा सकता है अथवा उसे झाड़—झाकड़ की तरह बेरोक टोक फैलने दिया जा सकता है। बगीचे में यदि उपयोगी बीज नहीं बोये गये तो बेकार के पेड़—पौधे तो उगेगें ही। जैसे माली अपने बगीचे में करीने से जमीन तैयार करता है, खरपतवार साफ करता है, अपनी जरूरत के अनुसार फल—फूल लगाता है, उसी तरह सारे खराब गलत, अशुद्ध विचारों की खरपतवार को उखाड़ते रहकर मनुष्य को अपने मन रूपी बगीचे का सुंदर बनाये रखना चाहिये और पूर्णत्व की ओर बढ़ने के लिए सही, उपयोगी और शुद्ध फल—फूलरूपी विचार बनाये रखकर, उसकी देखभाल करते रहना चाहिए।

विचार और चरित्र एक ही है और जिस तरह चरित्र केवल वातावरण और परिस्थितियों के द्वारा ही अपने आपको अभिव्यक्त करके समझा जा सकता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन की बाहरी दशाएँ उसकी आंतरिक दशाओं के सामंजस्य में प्रगट होती है।

अस्तित्व के नियम के अनुसार हर मनुष्य अपनी उस सही जगह पर है, जहाँ उसे होना चाहिए। जिन विचारों को वे अपने चरित्र में गढ़ा है, वही उसे वहाँ पर लेकर आये हैं।

जब तक मनुष्य बाहरी हालातों द्वारा निय़ंत्रित प्राणी मानता रहता है वह परिस्थितियों के थपेड़े खाता रहता है। परिस्थितियाँ विचार से उत्पन्न होती है। अत: विचार में शुद्धि लाकर मनुष्य परिस्थितियों को बदल सकता है।

आत्मा उस चीज को आकर्षित करती है जिसे वह रहस्यमयरूप से अपने हृदय में जगह देती है, वह उससे प्रेम करती है, और उससे डरती भी है। मनुष्य उन चीजों को आकर्षित नहीं करते हैं जो उन्हें चाहिये बल्कि उसे आकर्षित करते हैं जो वे हैं। उसे वह नहीं मिलता है जिसकी वह इच्छा या याचना करता है, बल्कि वह मिलता है जो उसने ईमानदारी से कमाया है। उसकी इच्छाएँ और याचनाएँ तभी सुनी जाती है और पूरी होती है जब विचार और कर्म के साथ उनका सामंजस्य यानि तालमेल हो जाता है।

मनुष्य निरंतर बाहरी परिस्थितियों से विद्रोह करता है, जब कि वह उसके कारण को हर समय अपनी हृदय में पोषित करते हुए सुरक्षित रखता है। मनुष्य अपनी परिस्थितियों को सुधारने के लिए चिंतित है, परंतु खुद को सुधारने के लिए वह तैयार नहीं है। इसलिये वे बंधन में रहते हैं। अपने लक्ष्य को पाने के लिए पहले मनुष्य को अनेक व्यक्तिगत त्याग करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

अच्छे विचारों और कर्मो का परिणाम कभी भी बुरा नहीं हो सकता और न ही बुरे विचारों और कर्मों का परिणाम अच्छा हो सकता है। तकलीफें सदा ही किसी न किसी दिशा में गलत विचार का परिणाम होती है। मनुष्य को दुख में जिन परिस्थितियों को सामना करना पड़ता है, वे उसके ही मानसिक असंतुलन का परिणाम है। जिन परिस्थितियों का प्रभाव सुखकारी होता है, वह मनुष्य के मानसिक सामंजस्य के कारण होता है। कोई मनुष्य धनी होते हुए भी अभिशप्त हो सकता है अथवा कोई गरीब होते हुए भी सौभाग्यशाली। ये दोनेां विचार के कारण ही होते हैं।

गरीबी और आसक्ति दुभाग्य के दो छोर हैं। मनुष्य सही मायने में मनुष्य तभी बनता है जब वह झींकना और झिड़कना बंद कर देता है। जब वह दूसरों को अपनी हालत का जिम्मेदार ठहराना बंद कर देता है। और खुद को महान और तेजस्वी विचारों से गढ़ने लगता है। वह परिस्थितियों से लड़ना बंद करके तेजी से अपनी प्रगति के लिए सहायक, साथ ही अपने अंदर के संभावनाओं और छिपी हुई क्षमताओं को ढूँढ़ने के साधन के रूप में उनका उपयोग शुरू कर देता है। मुनष्य यदि दोषयुक्त विचारों से मुक्ति पा ले तो सारा संसार उसकी ओर स्नेहपूर्ण होकर उसकी मदद करने के लिए तैयार हो जायेगा।

अध्याय तीन
Effect of thought on health and body (विचार का स्वास्थ्य और शरीर पर प्रभाव)

इस अघ्याय में लेखक जेम्स ऐलन का कहना है कि शरीर मन का सेवक होता है। यह मन के सारे क्रिया कलापों का पालन करते हैं, चाहे वह क्रिया कलाप जानबुझकर चुने गये हों या अंजाने में । बीमारी और स्वास्थ्य जैसी परिस्थितियाँ मूलरूप से विचार में होती है। ऐसा माना जाता है कि डर के विचार मनुष्य को इतनी तेजी से मार सकती है जैसे पिस्तौल की गोली। चिंता तुरंत ही पूरे शरीर को तोड़कर बिमारी के प्रवेश का रास्ता खोल देती हैं, जबकि दूषित विचार, शीघ्र ही स्नायुतंत्र को छिन्न—भिन्न कर देती है। ढृढ़, पवित्र और सुखद विचार शरीर को मनोहरता और ओजपूर्ण बनाते हैं।

मनुष्य जब तक दूषित विचार फैलाता जायेगा, तबतक उसमें प्रवाहित होनेवाला रक्त अशुद्ध और जहरीला होगा। कलुषित मन से भ्रष्ट शरीर और कलुषित जीवन उत्पन्न होता है। छल—कपट से रहित हृदय से स्वच्छ शरीर और विशुद्ध जीवन बनता है। शरीर को बिमारियों को दूर करने के लिए प्रसन्नता से भरे विचारों जैसा और कोई डॉक्टर नहीं है। सभी के बारे में अच्छा सोचना, सभी के साथ प्रसन्न रहना, धैर्यपूर्वक निस्वार्थ विचार ही स्वर्ग के द्वार है। और प्रतिदिन हर प्राणि के प्रति शांति के विचार बनाये रखने वालों को अनुपम शांति मिलेगी।

अध्याय चार
Thought and purpose ( विचार और उद्देश्य)

जब तक विचारों को उद्देश्य से न जोड़ा जाये, कोई भी बौद्धिक उपलब्ध नहीं होती। लक्ष्य विहीनता एक दुर्गुण है। वे लोग जिनके लिए जीवन में कोई विशेष उद्देश्य नहीं है, वे स्वयं पर तरस खाते हैं और आसानी से छोटी—छोटी चिंताओं, दुख—दर्द और तकलीफों के शिकार हो जाते हैं।
मनुष्य को अपने हृदय में किसी न्यायसंगत उद्देश्य को धारण करना चाहिए और उसे पूरा करने के लिए कृत संकल्प होना चाहिए। इस उद्देश्य को अपने विचारों का केन्द्र बिन्दु बनाना चाहिए। उद्देश्य को अपना सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य मानना चाहिए। यहाँ तक कि अगर वह बार—बार अपना उद्देश्य पूरा करने में असफल हो जाये, जैसा कि वह इस कमजोरी को दूर न कर ले। इस तरह प्राप्त चरित्र की शक्ति उसकी सच्ची सफलता का मापदंड होगी।

यह सत्य है कि प्रयास और अभ्यास से ही शक्ति विकसित की जा सकती है। जैसे शारीरिक रूप से कमजोर मनुष्य सावधानी और धैर्यपूर्वक प्रशिक्षित होकर अपने आपको शक्तिशाली बना सकता है, वैसे ही कमजोर विचारों वाला मनुष्य सही दिशा में चिंतन करके स्वयं को शक्तिशाली बना सकता है। अपने विचारों को पोषित करने के लिए वैचारिकरूप से शक्तिशाली व्यक्तियों की संगत करना चाहिए। अपने उद्देश्य को समझ लेने पर, उसे प्राप्त करने के

लिए मनुष्य को बिना दायें—बायें देखे मानसिक रूप से एक सीधा रास्ता चुन लेना चाहिए। संदेह और डर को मन से कड़ाई से निकाल देना चाहिए।

इस ज्ञान से कि हम इस काम को कर सकते हैं— इच्छाशक्ति अपने आप आ जाती है। संदेह और डर इस ज्ञान के सबसे बड़े शत्रु हैं। और वह जो डर और संदेह को नहीं मारता, जो इन्हें बढ़ावा देता है, खुद को हर कदम पर विफल कर देता है। वह जो डर और संदेह पर विजय पा ली, उसने असफलता को जीत लिया है।

अध्याय पाँच
The thought-factor in achievement (उपलब्धि में विचार—तत्व)

वह सब कुछ जो मनुष्य प्राप्त करता है या जो प्राप्त करने में असफल रहता है वह सीघे—सीधे अपने विचारों का परिणाम है। मनुष्य की परिस्थिति, कमजोरी और शक्ति, पवित्रता और अपवित्रता उसकी अपनी होती है, किसी और मनुष्य की नहीं। उसका दुख और उसकी खुशी भीतर से पैदा होती है। जैसा वह सोचता है वैसा ही वह होता है। जैसा वह सोचना जारी रखता है, वह वैसा ही रहता है। उसकी परिस्थिति को उनके अलावा कोई और बदल नहीं सकता। कोई बलवान मनुष्य दूसरे कमजोर मनुष्य की मदद तब तक नहीं कर सकता, जब तक वह कमजोर मनुष्य मदद लेने के लिए तैयार न हो।

मनुष्यों के लिए यह सोचना और कहना सामान्य होता है— बहुत से मनुष्य गुलाम होते हैं क्योंकि उनमें एक अत्याचारी है, हमें अत्याचारी से नफरत करना चाहिए। अब, फिर भी, कुछ लोगों में इस निर्णय को पलटने की प्रवृति बढ़ रही है कि वे कहें, एक मनुष्य अत्याचारी है क्योंकि बहुत से गुलाम होते हैं, तो हम गुलामों का तिरस्कार करें। सच्चाई यह है कि अत्याचारी और गुलाम अज्ञानता में सहयोगी है, उपरी तौर पर वे एक दूसरे को दुख देते हैं जबकि वास्तव में वे खुद को दुख देते हैं।

मनुष्य केवल अपने विचारों को सुधार कर ही उँचा उठ सकता है। अपने विचारो को उन्नत करने से इंकार करने पर वह कमजोर, दयनीय और दुखी रहता है। मनुष्य को किसी भी चीज को हासिल करने से पहले, चाहे वे सांसारिक वस्तुएँ ही हो, उसे अपने विचारों को उन्नत करना ही होगा।

यह ब्रह्मांड लोभी, बेईमान, झूठे और शातिर लोगों के पक्ष में नहीं रहता। वह उदार, सच्चे और ईमानदार लोगों की मदद करता है। बौद्धिक उपलब्धियाँ उन विचारों का परिणाम है जो ज्ञान की खोज के लिय अथवा जीवन और प्रकृति में सौन्दर्य और सत्य के प्रति समर्पित है। मनुष्य संसार में उच्च कोटि की सफलता हासिल कर सकता है और आध्यात्मिक क्षेत्र में भी बुलंदियों तक जा सकता है।

सभी प्रकार की उपलब्धियाँ चाहे वह व्यावसायिक, बौद्धिक या आध्यात्मिक जगत की हो, निश्चित रूप से विचारों का ही परिणाम है। त्याग किये बिना कोई भी प्रगति या उपलब्धि नहीं हो सकती। मनुष्य की सांसारिक सफलताएँ उसी अनुपात में होगी, जितना वह अपने भ्रामक पाश्विक विचारों को त्याग देता है। वह जो कम हासिल करना चाहता है उसे कम त्याग करना पड़ेगा। वह जो अधिक प्राप्त करना चाहता है, उसे अधिक त्याग करना पड़ेगा और वह जो उच्चतम को प्राप्त करना चाहता है, उसे महान त्याग करना पड़ेगा।

अध्याय छह
Visions and ideals (परिकल्पानाएँ और आदर्श)

लेखक का मानना है कि सपने देखने वाले विश्व के उद्धारक होते हैं। जो अपने हृदय में सुंदर परिकल्पना और उच्च आदर्श संजोता है, वही एक दिन उन्हें साकार कर सकता है। कोलम्बस ने एक अन्य विश्व की परिकल्पना संजोयी और उन्हें खोज भी निकाला, कोपरनिकस ने अनेक विश्व और विशाल ब्रह्मांड की परिकल्पना संजोए रखी और उन्हें उजागर किया, भगवान बुद्ध ने निष्कलंक सौंदर्य एवं उत्तम शांतिपूर्ण आघ्यात्मिक विश्व की परिकल्पना का अवलोकन किया और उसमें प्रवेश भी किया।

अपने स्वपनों को संजोए रखो, अपने आदर्शों को संजोए रखो, अपने हृदय को प्रेरित करने वाले संगीत को संजोए रखे, क्योंकि आपके मन में आकार लेती हुए सुंदरता, आपके विचारों को आच्छादित करने वाला माधुर्य तथा सारी आनंददायी परिस्थितियाँ इन्हीं में से विकसित होगी और स्वर्गीय वातावरण का विकास होगा। यदि आप इन सबके प्रति सच्चे हैं, तो अंत में आपका सपना अवश्य साकार होगा।

बड़ी से बड़ी उपलब्धि शुरू में एक स्वप्न ही थी। एक विशाल बरगद का पेड़ भी एक छोटी सी बीज में निहित था। आत्मा की उच्चतम कल्पनाशक्ति में एक जाग्रत फरिश्ता प्राण डालता है। स्वप्न असलियत के बीज हैं।

आपकी परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो सकती हैं, परंतु यदि आप किसी लक्ष्य को नजर में रखें और उस तक पहुँचने की कोशिश करें तो परिस्थितियाँ अधिक समय तक प्रतिकूल नहीं रहेगी। आप अपने अंतरतम की यात्रा करते हुए बाहर अविचल नहीं रह सकते। आपका आंतरिक झुकाव सदा ही उसकी ओर रहेगा, जिसे आप चोरी छिपे मने में सबसे ज्यादा चाहते हैं। आपके विचारों का शत—प्रतिशत परिणाम आपके हाथों में रखा जायेगा। आपका वर्तमान वातावरण चाहे कुछ भी हो, आपके अपने विचारों, आपके आदर्श, आपकी परिकल्पना के साथ ही आपका उत्थान या पतन होगा। अपने पर हावी इच्छा के अनुकूल, अपनी नगण्य अथवा प्रभावी महत्वाकांक्षा के अनुकूल ही आप महान बनते हैं।

विचारहीन, अनभिज्ञ और अकर्मण्य मनुष्य केवल सौभाग्य, संयोग और अवसर की बात करते हैं। किसी मनुष्य के आर्थिक, बौद्धिक और सामाजिक विकास को देखकर वे उनके भाग्य का चमत्कार मानते हैं। सफल लोगों की असफलताएँ, संघर्ष और मुसीबतें उन्हें दिखाई नहीं देती। वे कष्टों से भरी प्रक्रिया को नहीं समझते, केवल परिणाम को देखकर उसे संयोग मान लेते हैं।
सभी मानवीय मामलों में प्रयास की दृढ़ता ही परिणाम का मापक होते हैं— संयोग से कुछ नहीं मिलता। शक्तियाँ, भौतिक, बौद्धिक, आघ्यत्मिक संपत्तिरूपी उपहार प्रयास के ही फल है।

अध्याय सात
Serenity (प्रशांति)

बुद्धिमानी का एक बहुमूल्य सुंदर रत्न मन की शांति है। मनुष्य उसी अनुपात में शांत रहता है जितना कि वह स्वयं को विचारों द्वारा विकसित जीव समझता है। शांत प्रवृति का मनुष्य, खुद को काबू में रखना सीखकर, यह जान लेता है कि खुद को दूसरों के अनुकूल कैसे बनाया जाये। मनुष्य जितना ही भीतर से शांत होता जाता है, भलाई के प्रति उसकी सफलता, उसका प्रभाव और उसकी शक्ति उतनी ही अधिक होती जाती है। एक सामान्य व्यापारी भी अनुभव करेगा कि जैसे—जैसे वह आत्मनियंत्रण और धीरज विकसित करता है, अपने व्यापार में वह उतनी ही अधिक संपन्नता प्राप्त करता है, क्योंकि लोग हमेशा ऐसे मनुष्य के साथ संबंध रखना पसंद करेंगे जिसका व्यवहार और आचरण संयमित होता हैा शांत और प्रभावशाली मनुष्य हमेशा सम्मान और स्नेह का पात्र होता है।

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