सफल होने के लिए खराब दिमाग को ठीक करवायें।

यह सच नहीं है कि पृथ्वी पर सब चीजें सबके लिए नहीं है।  लेकिन क्या धन—दौलत और ज्ञान सबके पास समान है?  नहीं, और शायद कभी होगा भी नहीं।  जो असमानताएँ है, चाहे धन का हो, ज्ञान  का हो या अवसरों का हो, प्राकृतिक नहीं, कृत्रिम है।  व्यवहारिक नहीं वैचारिक है।  अगर आप जीवन में महान सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो कुछ बातें सीखना अति आवश्यक है, क्योंकि जो भी व्यक्ति महान सफलता प्राप्त किये हैं, वे सब इस पर आने—अंजाने में अमल अवश्य किये हैं।  सबसे पहले तो यह जान लें कि सफलता का पैमाना प्रत्ये​क व्यक्ति के लिए अलग—अलग होता है।  इसलिए यह सोचना कि मैं सफल होना चाहता हूँ, अपने आपको धोखा देना है।  प्रत्येक सफलता के बाद पुन: लक्ष्य निर्धारण किया जाना चाहिए।  इसका मतलब यह हुआ कि सफलता एवं लक्ष्य परिवर्तनशील है।  और यह प्रत्येक मनुष्य के लिए भी होना चाहिए, लेकिन वास्तविक जीवन में ऐसा हो नहीं रहा है।  ज्यादातर मनुष्य एक बार जीवन में लक्ष्य निर्धारित करते हैं।  उस लक्ष्य को पाने में सफल होते हैं।  फिर उसी के सहारे जीवन यापन शुरूकर देते हैं।  उनका पहला लक्ष्य ही जीवन में अंतिम लक्ष्य होता है।  एक उदाहरण से समझने का प्रयास करेंगे— एक छात्र का लक्ष्य है शिक्षक बनाना।  और वह छात्र शिक्षक के लिए आवश्यक योग्यता प्राप्त करने एवं आवश्यक प्रतियोगिता में सफल होकर या चयन का जो भी माध्यम होता है, में सफल होकर शिक्षक बन जाता है।  फिर कुछ वर्षों तक खुशी—खुशी जीवन व्यतीत करना शुरू कर देता है।  क्योंकि उसे मनावांछित लक्ष्य प्राप्त हो चुका है।  कुछ वर्षों के उपरांत वह उस जीवन को जीने के अभ्यस्त हो जाता है।  फिर वह स्थितियों से समझौता करना शुरू कर देता है, क्योंकि प्रत्येक मनष्य का प्रारंभिक लक्ष्य जीवन के कुछ वर्षों के बाद छोटा पड़ जाता है।  ​यदि आप आरंभ भी बहुत बड़ा यानि अव्यवहारिक लक्ष्य बना लेते हैं तो उसमें सफल होना भी संभव नहीं होता है।  इसलिए यह मत सोचये कि मनुष्य को प्रारंभिक लक्ष्य ही बहुत बड़ा बनाना चाहिए।

अगर मैं कहूँ कि मेरा दिमाग ठीक नहीं है तो आप लोगों के दिमाग, क्या सुझाव देगें? यदि आप लोग मेरे शुभ चिंतक हैं तो आप सभी अपने—अपने जानकारी के हिसाब से मुझे अच्छे से अच्छे डॉक्टर से इलाज करवाने की सलाह देगें।  इसपर मैं कहूँगा कि आप सबों के दिमाग भी खराब है तो आप लोगों को पक्का यकीन हो जायेगा कि मेरा दिमाग सचमुच में ख्रराब है।  अब मैं यह कहूँगा कि आप लोगों ने जिन—जिन डॉक्टरों से इलाज करवाने की सलाह दिये ​थे, वे सारे डॉक्टरों के भी दिमाग खराब है।  अब आप लोग कहेगें कि मेरा​ दिमाग खराब नहीं है, मैं तो सचमुच पागल हो चुका हूँ। अक्सर ऐसी परिस्थितियाँ लोगों के सा​थ कई बार घटित हो चुकी है एवं होती रहती है।  अब मैं मेरे, आपके एवं डॉक्टरों के दिमाग खराब होने की प्रमाण उदाहरण के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ।  यह बहुत सरल और सहज है और हम सबमें से ज्यादातर को पता भी है, लेकिन कभी इस ओर ध्यान ही नहीं गया।  या इसपर गंभीरता से विचार ही नहीं किया।

आईये इसे एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं।  मान लिजिये मेरे पास जो गाड़ी है वह 100 किलोमीटर प्रति घंटा के रफ्तार सक चल सकती है, और मैं इसे खाली सड़क पर 6 या 8  किलोमीटर प्रति घंटा के रफ्तार से चला रहा हूँ, जबकि मैं बढ़िया ड्राइव करता हूँ।  यह देखकर लोग क्या कहेगें। या सोचेंगं? शायद गाड़ी खराब होगी।  और ज्यादातर बार यह सच भी होता है।  लेकिन दिमाग के मामले में लोग इसे सच नहीं मानते हैं।  ज्यादातर जानकार लोगों को पता है कि आम जनता यानि हम सब दिमाग का सिर्फ दो से चार प्रतिशत ही इस्तेमाल कर पाते हैं, और करते भी है।  अब इसके दो ही कारण हो सकते हैं, जिस प्रकार गाड़ी के मामले में या तो गाड़ी खराब हो या ड्राईवर खराब हो तो रफ्तार कम हो जाती है।  उसी प्रकार दिमाग के मामले में दिमाग खराब हो या उसे चलाने वाला खराब हो तो इसका न्यूनतम उपयोग हो सकता है।  चूँकि दिमाग ही दिमाग का ड्राईवर होता है,  इसलिए अंतत: दिमाग के ही खराब होना कहा जा सकता है।  जो इस सत्य को स्वीकारते हैं वे ही महान सफलता प्राप्त करते हैं क्योंकि वे अपने खराब दिमाग का समय—समय पर इलाज करवाते रहते हैं।  जो इस सत्य को नहीं स्वीकारते हैं वे धन्य हैं।  उनकी संख्या भी ज्यादा है।  वे गलत तो हो ही नहीं सकते हैं ।  इसलिए वे सिर्फ खराब दिमाग वालों का अनुचर बने रहते हैं।  अगर आपको भी महान सफलता प्राप्त करना हो तो जल्द से जल्द अपने दिमाग का ईलाज करवा ना शुरू कर दें।  और समय—समय पर गाड़ियों की भाँति ही इसका सर्विसिंग करवाते रहें ताकि रफ्तार बनी रहे।

अब सबाल उठता है कि खराब दिमाग का उपचार यानि ईलाज किससे करवाया जाये क्योंकि मैंने तो आपलोगों के सुझाये गये सारे डॉक्टरों को भी अयोग्य यानि पागल करार कर दिया था।  हो सकता है उनमें से एकाध डॉक्टर अपवादस्वरूप योग्य भी हों परंतु उन्हें ढूँढ़ना होगा।  यह असंभव भी नहीं है।  बस अपनी सोच बदलना होगा और वास्तविकता को स्वीकारना होगा।

आईये एक उदाहरण से समझते हैं कि खराब दिमाग को दुरूस्त करनेवाले डॉक्टर कौन और कहाँ मिलेंगे।  हम लोगों में से लगभग व्यक्ति कंप्यूटर अथवा स्मार्टफोन अथवा दोनों का उपयोग करतें हैं।  यहाँ मैं दो स्थितियों का जिक्र करूँगा।  और दोनों ही स्थितियों को ध्यानपूर्वक समझने की आवश्यकता है।

स्थिति एक: मुझे एक नया लैपटॉप कंप्युटर खरीदना है।  मैं एक अच्छा सा शोरूम जाता हूँ और अपनी आवश्यकता बताता हूँ।  दुकानदार पूछता है कि आपका बजट कितना है? मै कहता हूँ कि बजट की कोई चिंता नहीं है।  तो दुकानदार एक लेटेस्ट मॉडल का लैपटॉप कंप्युटर दिखाता है।  मान लिजिये उसका कीमत एक लाख बताता है, लेकिन वह कहता है​ कि उसमें आपको सॉफटवेयर अलग से इंस्टाल करवाना होगा।  हम सिर्फ हार्डवेयर बेचते हैं।  पर हमारे यहाँ सबसे बढ़िया हार्डवेयर मिलते हैं।  इसकी गारंटी है।  मैं आपको उस साफ्टवेयर इंजिनियर का पता दे देता हूँ, वे आपके आवश्यकतानुसार साफ्टवेयर इंस्टाल कर देगें।  और इंस्टाल किये गये साफ्टवेयर के हिसाब से आपसे पैसे लेगें।  यह आपके लिए फायदेमंद रहेगा।  और मैं ऐसा ही करता हूँ।  लैपटॉप कंप्यूटर तो महंगा खरीद लेता हूँ पर साफ्टवेयर इंस्टाल नहीं करवाता हूँ।  रूपये बचाने के लिए या यह सोचकर कि मैंने महंगा हार्डवेयर खरीदा है तो साफ्टवेयर पर खर्च क्यों करूँ?  परिणाम क्या होगा।  मेरा लैपटॉप कंप्युटर किसी काम का नहीं होगा।  मैं उसे केवल आन/आफ  कर पाउँगा।

स्थिति दो: मेरे पास एक लैपटॉप कंप्युटर है, जिसका प्रोग्राम करप्ट हो गया है। यानि इंस्टाल किये गये साफ्टवेयर पर बाहरी वायरस का हमला हुआ है और जिसके चलते साफ्टवेयर खराब हो गया है।  अब मैं उसे एक अच्छे हार्डवेयर इंजीनियर के पास ले जाता हूँ, जो साफ्टवेयर के बारे में बिल्कुल नहीं जानता है।  उससे कहता हूँ कि मेरे लैपटॉप को सही कर दें ।  वह थोड़ी बहुत जाँच करने के बाद कहते हैं कि इसका हार्डवेयर तो ठीक है। आप किसी साफ्टवेयर इंजीनियर के पास जाइय्रे।  लेकिन मैं अपनी जिद पर अड़ जाता हूँ कि लैपटॉप तो आपसे ही ठीक करवाना है ।  परिणाम क्या होगा?  हमारा लैपटॉप कंप्युटर किसी काम का नहीं रहेगा।

अब ऊपर के दोनों स्थितियों पर गौर करने पर यह निश्कर्ष निकलता है कि लैपटॉप कंप्यूटर सही—सही काम करे, इसके लिए चार चीजें आवश्यक है—

पहला: अच्छे हार्डवेयर के साथ—साथ उपयुक्त सॉफ्टवेयर भी होना चाहिए।

दूसरा: सॉफ्टेवेयर करप्ट न हो यानि उस पर बाहरी वायरस का हमला न हो, इसलिए एंटी वायरस भी इंस्टाल होना चाहिए।

तीसरा: एंटी वायरस सहित तमाम सॉफ्टवेयरों को समय—समय पर अपडेट करते रहना चाहिए। और

चौथा: हार्डवेयर भी सुरक्षित रहे, इस​लिए इसके रख—रखाव पर भी उचित ध्यान देना चाहिए।

मनुष्य का शरीर भी कंप्यूटर या स्मार्टफोन के तरह ही है, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर इसमें भी है।  इसे समझने के लिए उदाहरण लेतें हैं— जब मानव शिशु जन्म लेता है तो इसमें सॉफ्टवेयर नाममात्र इंस्टाल रहता है। मसलन सिर्फ आन/आफ जैसा।  माता—पिता, परिवार के अन्य सदस्य बढ़ते उम्र के साथ बच्चे में तरह—तरह के सॉफ्टवेयर जिसमें चलने—फिरने, खाने—पीने, बोलने, नहाने—धोने जैसी दैनिक क्रियाओं के साथ—साथ सामान्य ज्ञान, आचार—व्यवहार इत्यादि इंस्टाल करते हैं।  बाद में समाज के बड़े सॉफ्टवेयर इंजीनियर जैसे शिक्षक, प्रशिक्षक भी आवश्यकतानुसार ज्ञान—विज्ञान का सॉफ्टवेयर इंस्टाल करते हैं।  शिशु जैसे—जैसे बड़ा होते जाता है, उसमें अपडेशन की प्रकिया शुरू हो जाती है। तब वे अपने ज्ञाननेद्रिंयों से अनुभव करके भी स्वयं को अपडेट करते रहते हैं।  यह प्रकिया उम्रभर चलती रहती है।  पृथ्वी पर समस्त जीवों में सिर्फ मानव में ही यह सुबिधा उपलब्ध है। बाकी किसी जीव में नहीं है। अगर होता तो शायद गाय का बछड़ा या अन्य जीवों के बच्चे बाद में मानव शिशु से ज्यादा समझदार एवं ज्ञानवान होता क्योंकि जन्म के समय अन्य जीवों के बच्चों में मानव शिशु से कहीं ज्यादा सॉफ्टवेयर इंस्टाल रहता है, जैसे खड़ा होना, चलना—फिरना, माँ के स्तनों से दूध पीना, तैरना, दौड़ना, खतरे के संकेतों को भाँपकर अपनी सुरक्षा के उपाय करने जैसी क्रियाओं के सॉफ्टवेयर प्री—इंस्टाल रहता है। लेकिन बाकी जीवों के बच्चे मानव शिशु से बाद में ज्यादा होशियार इसीलिए नहीं हो पाता है क्योकि उसके हार्डवेयर में नये सॉफ्टवेयर इंस्टाल करने एवं उसे अपडेट करने की व्यवस्था नहीं रहता है, यानि मेमोरी फुल रहता है।

अब हम समझ चुके हैं कि मानव शरीर के दो व्यवहारिक भाग है— पहला हार्डवेयर जिसके अंतर्गत तन यानि शरीर आता है दूसरा इसके अंदर का सॉफ्टवेयर, जिसके अंतर्गत मन और आत्मा आते हैं।  शारीरिक विकास के लिए एवं इसके रख—रखाव के लिए हमलोगों को प्रतिदिन भोजन करना पड़ता है।  मानसिक और बौद्धिक विकास यानि सॉफ्टवेयर इंस्टालेशन एवं अपडेशन की प्रकिया पर हमलोग बचपन से लेकर युवावस्था तक बहुत जोर देते हैं। अच्छा आचार—व्यवहार हो ऊँची से ऊँची शिक्षा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। यहाँ गौर करने की बात यह है कि इस दौरान हमलोग एंटी वायरस सॉफ्टवेयर इंस्टालेशन एवं अपडेशन पर कभी भी पूरा ध्यान नहीं देते हैं। जिसका दुष्परिणाम परिवार, समाज, देश एवं संपूर्ण विश्व को भुगतना पड़ता है।  मानवीय दुर्गुणों की व्यापकता संभ्रात परिवारों यानि शिक्षित एवं समर्थ परिवारों में भी पाया जाता है, बल्कि ज्यादा पाया जाता है। अब सबाल यह भी खड़ा होता है कि आखिर यह एंटी वायरस सॉफ्टवेयर कौन सा है और क्या काम करता है? हाँ, इस एंटी वायरस सॉफ्टवेयर पर मानव समाज आदिकाल से ही काम करता आ रहा है। जिसका सीधा संबंध मन और आत्मा से था, लेकिन सॉफ्टवेयर की भी शत—प्रतिशत कामयाब नहीं रहा। यह धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र के रूप में था एवं है, लेकिन परिणाम कभी भी आशाजनक नहीं रहा। इसे एक विडंबना ही कहा जा सकता है।  मैं धर्मों की आलोचना नहीं कर रहा हूँ।  पर यह भी सच है कि संसार में अबतक जितनी मौतें धार्मिक कट्टरता के कारण हुई हैं, अन्य किसी कारण से नहीं हुई है।

अब हम मूल विषय पर आते हैं, अबतक हम लोग जान चुके हैं कि हमलोग बचपन से लेकर किशोरावस्था एवं युवावस्था के प्रारंभिक ​वर्षों ​तक दिमाग के सॉफ्टवेयर इंस्टालेशन एवं अपडेशन पर बहुत जोर देते हैं, यह अलग बात है कि कामयाव एंटी वायरस के सॉफ्टवेयर नहीं हैं, फिर जो भी है उसी से काम चलाना मजबूरी है।  उसके बाद यह काम बंद सा हो जाता है।  यही से शुरू होता है हमारा जीवन का सफर और यहाँ पर लिये गये हमारे निणर्यों से हमारा भविष्य तय होता है। अब प्रश्न  यह उठता है कि क्या हमारा दिमाग स्वतंत्र रूप से सोचता है या निर्णय देता है? अक्सर हम सुनते हैं कि उसका विचार बिल्कुल नया है या बिजनेस के नया आइडिया से वह करोड़ों कमाया इत्यादि।  तो जान लें दिमाग स्वतंत्र रूप से बिल्कुल नहीं सोचता है और नया आइडिया वास्तव में नया नहीं हो सकता।  विचार या आईडिया, ऊर्जा का ही एक रूप है और विज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि ऊर्जा का न तो निर्माण किया जा सकता है, ना ही क्षय यानि नष्ट किया जा सकता है। तो दिमाग करता क्या है? जैसे कंम्पुटर या स्मार्टफोन में इंटरनल डिस्क होता जिसमें तमाम तरह के सॉफ्टवेयर रहता है, उसी तरह दिमाग भी शरीर का एक इंटरनल डिस्क है जिसमें हमारे द्वारा इंस्टाल और अपडेटेड सॉफ्टवेयर रहता है।  जो करोड़ों—अरबों सूचनाओं का संग्रह कर सकता है। इसकी क्षमता असीमित है। हमारी सोच, हमारा विचार एवं हमारा हर क्रिया—कलाप हमारे दिमाग में उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर ही होता है।  दिमाग बस समय आने पर यानि आवश्यकतानुसार इन करोड़ों —अरबों सूचनाओं में से संबंधित विषय के सूचनाओं को हमारे सामने विकल्प यानि आप्शन के रूप में रखता है।  हम उन कई आप्शनों में से एक को चुन लेते हैं। यही वजह है कि जो सूचनाएँ हमारे दिमाग में उपलब्ध नहीं है उसके बारे में हम कुछ नहीं बोल सकते, या कर सकते हैं। मान लिजिये तैड़ाकी का सॉफ्टवेयर दिमाग में नहीं हो तो हम पानी में तैर नहीं सकते।

मूल सबाल यानि दिमाग खराब है, इसको ठीक कैसे करें या करवायें अभी भी यथावत है।  लेकिन इतना तो हमलोग अवश्य जान गये हैं ​या कह सकते हैं कि यह सब तो जानते ही है कि हार्डवेयर इंजीनियर सॉफ्टवेयर को और सॉफ्टवेयर इंजीनियर हार्डवेयर को ठीक नहीं कर सकते हैं।

गाड़ी वाले उदाहरण से हम जान चुके हैं कि गाड़ी को बहुत कम  रफ्तार से दो ही स्थितियों में चलाया जाता है— यदि गाड़ी खराब हो या ड्राईवर खराब हो। इसी तरह अगर हम अपने दिमाग का उपयोग पूरा नहीं कर रहे हैं , आधा भी नहीं कर रहे हैं, यहाँ तक कि एक चौथाई भी नहीं कर रहे हैं तो इसे खराब नहीं तो और क्या कहा जा सकता है?  इसे ठीक करने के लिए यानि इसको पूरी रफ्तार से चलाने के लिए गाड़ी और ड्राईवर दोनों को ठीक करना आवश्यक है।  दिमाग बढ़िया से काम करे इसके लिए जरूरी है कि इसके सॉफ्टवेयर का लगातार अपडेट करते रहें एवं नये सॉफ्टवेयर आवश्यकतानुसार इंस्टाल करते रहें।  दिमाग तेजी से काम करे इसके लिए यह भी आवश्यक है कि बिना काम के सॉफ्टवेयर इंस्टाल न हो और अगर हो गया है तो उसे डिलीट या अनस्टाल करते रहें।  एंटी वायरस का सॉफ्टवेयर नैतिकता, कर्तव्य और पारिवारिक, सामाजिक और देश के प्रचलित मान्यताओं और नियमों का पालन करना ही है।

मान लिजिये कोई दिमाग में सूचना एकत्रित किया कि झूठ बोलना, गबन करना या किसी की हत्या करना पाप नहीं है यानि गलत नहीं है तो वह इन सबको करने में कभी हिचकेगा नहीं, लेकिन समाज और राज्य में प्रचलित मान्यताओं और नियमों के अनुसार उसे सजा अवश्य मिलेगी यानि दुष्परिणामों का उसको सामना आज नहीं तो कल अवश्य करना पड़ेगा।  देश—विदेश में ऐसे इंजीनियरों की संख्या अब धीर—धीरे बढ़ते जा रहे हैं, जो हमारे दिमाग में ऐसे काम के सॉफ्टवेयर इंस्टाल एवं अपडेट करते हैं।  जिसे हमलोग मोटीवेशनल स्पीकर, लाईफ कोच, बिजनेस कोच, तरह—तरह के स्पोट्स के कोच एवं जीवन से जुड़े प्रत्येक क्षेत्र के ट्रेनर कह सकते हैं।  बगैर इनकी सहायता के हमलेाग दिमाग का भरपूर इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं।  आशा है कि मेरी बाते आपलोगों को अच्छी लगी होगी धन्यवाद।

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