अगर सफलता चाहते हैं तो भीड़ से अलग चलना सीखिए।

दोस्तों एक पुरानी कहावत है:—

लीक—लीक गाड़ी चले लीकहीं चले कपूत।

लीक छोड़ तीनों चले शायर, सिंह और सपूत।

पुराने समय में जब सड़कें कच्ची हुआ करती थी तो गाड़ी यानि बैलगाड़ी के चलने से सड़कों पर दोनों पहिए का निशान बन जाता था।  जिसे लीक कहा जाता था। बैलगाड़ी के पहिए के निशान से सड़कों पर गढ्ढे हो जाया करती थी। जिसपर बैलगाड़ी आसानी से चलती थी।  लीक से हटकर बैलगाड़ी का चलना असंभव सा था।  अत: गाड़ी लीक पर यानि पहले के बनाये हुए रास्ते पर चलती थी और कपूत भी लीक पर ही चलता है। कपूत का लीक पर चलने का मतलब है समाज में प्रचलित पुरानी मर्यादाएँ, अंधविश्वास कुरीतियाँ, नियमों का पालन करना वाला। ऐसे पुत्र जो समाज में नवाचार नहीं ला सके, जो पुरानी ढ़र्रे पर चले उसे सुपुत्र नहीं कुपुत्र कहा जाता है। यह कहा गया है कि लीक को छोड़कार तीनों चलते हैं यानि पुरानी ढ़र्रे जो लाभदायक नहीं है उसे छोड़कर ये तीनों चलते हैं, शायर यानि कवि, सिंह यानि जंगल का राजा या शक्तिशाली व्यक्ति और सुपुत्र।

अगर इसका विस्तार किया जाये तो आप पायेगें कि जिस व्यक्ति परिवार, समाज या राष्ट्र में लीक छोड़ने की क्षमता नहीं होता है, वे कभी सफल या समर्थ नहीं हो सकते हैं। आप अपने आस—पास के सफल व्यक्तियों के बारे में पता कर यह आसानी से सीख सकते हैं।  विकसित समाज या देश के बच्चे खोजी प्रवृति के या बिद्रोही प्रकृति के होते हैं।  हाँ विकसित का मतलब सिर्फ धनवान होना नहीं है, विकसित मानसिक रूप से भी हो सकता है।

कहा गया है भीड़ और भेड़ स्वयं के दिमाग का इस्तेमाल नहीं करते हैं।  आपमें से कइयों ने देखा होगा चरवाहा सिर्फ एक भेड़ को आगे का रास्ता दिखाता है,या हाँकता है बाकी सभी भेड़ें उसके पीछे अपने—आप आती जाती है।  किसी भी भीड़ के द्वारा जब कोई उपद्रव होता है तो केवल एक—दो व्यक्ति उपद्रव करना शुरू करता और देखते—देखते सैकड़ों हजारों लोग शुरू हो जाता है बिना सोचे—समझे। समाज के बहुसंख्यक लोगों का जिस काम में सम्मति हो, ऐसा नहीं है वह कार्य अपेक्षित फलदायक होगा।  हो सकता है समाज उससे आगे अभी देखा नहीं हो।

समाज हमेशा नये कार्य शुरू करने वालों का उपेक्षा करता है।  लेकिन जो धैर्यशील, गंभीर पुरूष होता है वह उपेक्षाओं, आलोचनाओं पर ध्यान न देकर अपना कार्य करने में मशगुल रहता है।  नेता—अभिनेता, साधु—संत उद्योगपति, कलाकार हर क्षेत्र के लोग सफल वहीं हैं जिन्होंने भीड़ से हटकर अपनी पहचान बनाई।  अगर आपको केवल जीवन गुजारना हो तो भीड़ के साथ रहिये।  आखिर जानवर भी तो जिंदगी गुजार ही लेते हैं।  अगर जीवन जीना है तो समाज के बंधनों से मुक्त हो जाईये।  समाज के बंधनों से मुक्त होने का मतलब यह कतई नहीं है कि आप संयासी बन जाएं। बंधन से मुक्त होने का मतलब है कि आप कुछ नया करें।  लीक से हटकर चलें। आपके इस व्यवहार से समाज में परिवर्तन होगा। आप सिर्फ सफल ही नहीं होंगे बल्कि आप सफलतम लोगों में से एक होंगे।

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