आप जिद्दी हैं, नहीं तो आप पिद्दी हैं।

मानव का वास्तविक गुण मानव में कब होता है?  अक्सर हम सब मानव के गुणों एवं दुगुर्णों की चर्चा करते हैं तब हम यह भूल जाते हैं कि इनमें से अधिकांश गुण—दुर्गुण जो हममें हैं वे वास्तविक या जन्मजात तो हैं ही नहीं। ये काल्पनिक हैं। ये शिक्षण के परिणाम हैं। यह भी सच है कि जो गुण हमने सीखा है, वे वास्तव में लाभदायक भी है और समाज के लिए उपयोगी एवं आवश्यक भी है। मसलन परोपकार हमारा जन्मजात गुण नहीं है फिर भी यह परिवार एवं समाज के लिए अत्यंत लाभदायक एवं आवश्यक गुण है। यहाँ तक तो ठीक है कि हमने समय के साथ—साथ बहुत सारे गुणों को अपनाया, लेकिन जिन गुणों को इस दौरान हमने छोड़ दिया क्या वे हमारे लिए लाभदायक थे या नहीं? इसपर हमने कभी विचार किया ही नहीं अपितु अपने श्रेष्ठ गुरूजनों के बातों को अक्षरश: पालन किया।  अगर विचार किये होते तो शायद कुछ भूले—बिसरे गुण हमें अत्यंत लाभदायक लगता और उसपर हम दुबारा चिंतन—मनन करते। हमारे द्वारा अपने जन्मजात गुणों को भूल जाना लाभदायक कदापि नहीं हो सकता है। जरा सोचिये अगर वह लाभदायक नहीं होता तो हम उन गुणों के साथ पैदा ही क्यों होते? आस्थावान यानि आस्तिकों को यह बात मानने में तो देर नहीं लगेगी, लेकिन नास्तिक जो वैज्ञानिक आधार या तर्क को मानते हैं वे भी सहमत होगे कि मनुष्य जिस अंग का उपयोग नहीं करते हैं या करना छोड़ देते हैं, भविष्य में उस अंग का हमारे शरीर में बना रहना मुश्किल हो जाता है। शायद यही बात हमारे गुणों और विचारों पर भी लागू होता हो। अत: यह बात तो तय हैं कि हमारे लिए हमारे जन्मजात गुण आवश्यक है।  अगर हम उसे छोड़ते हैं तो निश्चय ही हम कुछ—न—कुछ सही नहीं कर रहे होते हैं।

अब आईये उस गुण के बारे में विचार करते हैं जिसके लिए यह भूमिका बानाई गई। दोस्तों कई बच्चों या यूँ कहें तो लगभग सभी स्वस्थ बच्चों को आपने जिद करते हुए देखा होगा। शायद ही कोई साधारण बच्चा हो जो जिद नहीं करता हो। अगर कोई बच्चा जिद नहीं करता है तो समझ जाइये कि कुछ—न—कुछ गड़बड़ है। बच्चा चाहे गरीब का हो या अमीर का जिद करना उसका नैसर्गिक यानि जन्मजात गुण है। हम सब इस दौर से गुजरे ही हैं। बच्चों का जिद होता ही क्या है? चॉकलेट, आईसक्रीम या खिलैना के लिए ही बच्चे जिद करते हैं। और ज्यादातर बच्चे तब तक शांत नहीं होते हैं जब तक उनकी जिद यानि मांग पूरी नहीं हो जाती है। हलांकि जैसे—जैसे समाज सभ्य होता गया, जिद्दी बच्चों को नटखट या नालायक बच्चा और ​जो जिद नहीं करता है, उसे समझदार बच्चा माना जाने लगा।  सारी गड़बड़ी यहीं से शुरू हुई।  आज अगर कोई बच्चा आइसक्रीम खाने की जिद करता है तो पहले तो हम उसे आईसक्रीम से होने वाले दस नुकसान गिना देते हैं फिर भी नही माना तो “अच्छे बच्चे जिद नहीं करते” इस प्रकार का ब्रह्मशास्त्र छोड़ते हैं। शायद बच्चा मान जाता है। इस प्रकार बच्चा और अभिभावक दोनों समझदारों की श्रेणी में आ जाते हैं, लेकिन इसके दुष्परिणाम के बारे में दोनों में से किसी को फिक्र नहीं है। बच्चा जो इसके नुकसान के बारे में सोच नहीं सकता है इसलिए सोचता नहीं है, और अभिभावक जो सोच सकते हैं उन्हें यह पता ही नहीं है कि हम वास्तव में उस बच्चे के साथ अन्याय कर रहे हैं।

दोस्तों हम सब जानते हैं एवं भी मानते हैं कि बच्चे ईश्वर का रूप होता है या बच्चों में ईश्वर का वास होता है तो बच्चों के गुणों को हम अलाभकारी क्यों मानते हैं।  बचपन के गुणों को हम उम्रभर क्यों नहीं अपनाते हैं? यहाँ ध्यान देने योग्य बातें हैं कि आईसक्रीम खाना हो सकता है कि स्वास्थ्य के लिए लाभदायक नहीं हो पर इसके लिए बच्चों के जिद करने की गुण को हमें दबाना नहीं चाहिए था। जिद करने और रचनात्मकता में चोली—दामन का संबंध है। जिन घरों में बचपन से ही जिद न करने की सलाह दी जाती है। वहाँ के लोगों में बचपन से ही रचनात्मकता समाप्त कर दी जाती है।  कोई भी नवनिर्माण जिद्दी व्यक्ति ही कर सकता है।  इतिहास गवाह है।  उदाहरण देने की आवश्यकता नहीं है। अपनढ़—गँवार, गरीब, असहाय दशरथ मांझी जिद्दी थे। पहाड़ काटकर ही दम लिये। एक पैर गँवाने के बाद भी माउंट एवरेस्ट पर झंडा गाड़ने वाली अरूणिमा सिंहा की जिद ही थी । नहीं तो आम व्यक्ति तो इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। बचपन के इस गुण को जिन्होंने सँवारा वे एक से एक महानतम कार्य कर दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिये। मतलब साफ है “जो जिद्दी नहीं है वह पिद्दी है”। पिद्दी यानि बहुत छोटा जीव। तो दोस्तों आज से ही अपने बच्चों के इस गुण यानि जिद करने की गुण को सँवारने का मौका दिजिये। वर्णा आपका बच्चा पिद्दी ​बनकर जीवन गुजारेंगे। संसार में थोड़े से अभिभावक हैं जो जानते एवं मानते हैं कि बच्चों के इस नैसर्गिक गुण यानि जिद्दीपन को बचाये एवं बनाये रखना चाहिए। जिद्दी व्यक्ति ही संसार में हर वह काम किये हैं जो मानव जीवन को सुगम बना रहीं है।  इतिहास रचने वाले शत—प्रतिशत जिद्दी होते हैं। बच्चों की जिद अगर उसके पिता पूरी कर सकते हैं तो जरा सोचिये हमारी जिद क्या परमपिता पूरी नहीं करेंगे। अगर आपने कुछ करने का या पाने का सपना देखा है तो जिद्दी बनिये। जब तक आपका सपना पूरा नहीं हो जाये तब तक जुटे रहिये। आप अवश्य ही सफल होंगे। इसमें रत्तीभर भी संदेह नहीं होना चाहिए।

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