OBC आरक्षण संशोधन बिल पास

राज्यसभा में भी ओबीसी आरक्षण संशोधन बिल 2021 पास हो गया है, लोकसभा में भी बहुमत से मंजूर बिल हुआ था. बिल के पक्ष में 385 वोट पड़े, किसी ने विरोध नहीं किया.

राज्यसभा में OBC आरक्षण संशोधन बिल पास हुआ. इस बिल के कानून बनने बाद राज्यों को OBC लिस्ट बनाने का अधिकार होगा. जिसे 127 वें संविधान संशोधन बिल से आर्टिकल 342 ए(3) लागू किया जाएगा. राज्य अपने हिसाब से OBC सूची तैयार कर सकेंगे. पहले OBC सूची का अधिकार सिर्फ केंद्र के पास था. आरक्षण पर 50% की सीमा हटाने की मांग जिन-जिन पार्टियों ने की. उसमें कांग्रेस (Congress), बीजू जनता दल (BJD), शिवसेना (Shiv Sena), समाजवादी पार्टी (SP), बहुजन समाज पार्टी (BSP), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP), जनता दल यूनाइटेड (JDU), अपना दल (Apna Dal), तेलुगु देशम पार्टी (TDP), ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (AIMIM) शामिल हुए.

OBC पर कैसा संशोधन विधेयक?

केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 342A, अनुच्छेद 338B और अनुच्छेद 366 में संशोधन का विधेयक संसद में पेश किया. जिसमें संविधान में 127वें संशोधन के बाद राज्यों को अन्य पिछड़ा वर्ग के दायरे में किसी जाति को शामिल करने का अधिकार मिल जाएगा.

OBC पर संशोधन विधेयक क्यों?

OBC आरक्षण बिल कानून बनने के बाद महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पटेल, हरियाणा में जाट समुदाय और कर्नाटक में लिंगायत समुदाय को OBC वर्ग में शामिल करने का मौका मिल सकता है. मतलब आने वाले दिनों में कई राज्यों में सियासत की सुई OBC कल्याण और सूची के इर्द गिर्द ही घूमेगी. आपको बताते हैं इस बिल के लागू होने से किसको फायदा होगा-
 
दरअसल अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण का मुद्दा सीधे वोटबैंक से जुड़ा है. महाराष्ट्र में मराठा, राजस्थान में गुर्जर, हरियाणा में जाट, कर्नाटक में लिंगायत. हर राज्य में कई जातियां ओबीसी में शामिल होने के लिए आंदोलन करती रही हैं. और इसका खामियाजा केंद्र को उठाना पड़ता था. अब ओबीसी में नई जातियों को शामिल करने का हक राज्यों को मिलेगा तो बीजेपी इसका दोहरा फायदा उठा सकती है.

इस संविधान संशोधन के बाद यूपी की राज्य सरकार 39 जातियों को ओबीसी लिस्ट में शामिल कर सकती है, जबकि इससे पहले ही यूपी में 79 जातियों को ओबीसी का दर्जा हासिल है. हालांकि ओबीसी आरक्षण के फायदे की बात की जाए तो केंद्रीय सूची में अभी ओबीसी के अंदर मौजूद 2700 जातियों में से सिर्फ 1000 जातियां ही आरक्षण का फायदा उठा पा रही हैं.

निश्कर्ष: कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि नये परिदृश्य में उन लोगों का सपना पूरा नहीं हा पायेगा, जिन्होंने अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देकर सामाजिक समरसता लाना चाह रहे थे। अब आन्दोलन के जरिये समर्थ जातियाँ ही आरक्षण सूचि में शामिल होकर शैक्षणिक और राजनैतिक लाभ लेगी। हलांकि अब तक यही तो हो रहा था, लेकिन अब इसकी गुंजाईश ज्यादा हो जायेगी। जो जातियाँ समाज में अपने आपको क्षत्रिय कहती हैं और पिछड़ी जातियाँ का शोषण करती हैं, अब वोट बैंक के कारण पिछड़े वर्ग में शामिल हो जायेंगी। और जहाँ मलाई खाना हो वहाँ शुद्र बन जायेंगे और जहाँ शोषण करना हो वहाँ क्षत्रिय बन जायेंगे। एक तरह से सरकार कमजोरों की राह और मुश्किल कर दिये। अब इनका सहारा कौन बनेगा?

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