जीवन की निरर्थकता

तृतीय अध्याय नीति :3-20

जीवन की निरर्थकता

चाणक्य नीति के तृतीय अध्याय के बीसवें नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति न तो अच्छे काम करके धर्म में बृद्धि करता है, न ही धन कमाता है, न काम—भोग करता है और न ही मोक्ष को प्राप्त करता है, उसका जीवन निरर्थक है। उसका जीना या मरना एक समान है।

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