परधीनता में सुख नहीं

पंचदश अध्याय नीति : 14-15

परधीनता में सुख नहीं

चाणक्य नीति के पंचदश अघ्याय के चौदहवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि चन्द्रमा का शरीर अमृत से बना है, वह अमृत का भंडार है और उसे औषधियों का स्वामी माना जाता है। उसकी सुंदरता अनुठी है। इतना सब होने पर भी सूर्य के उग आने वह फीका हो जाता है। उसका अमृत भी रक्षा नहीं कर पाता। दिन सूर्य का घर है। दूसरे के घर में जाने पर किसी को आदर नहीं मिलता। पराये घर में सभी छोटे हो जाते हैं। पराये घर में रहना दुख ही देता है।

भँवरा कमलदलों के बीच में रहता था और कमलदलों का ही रस पीकर अलसाया रहता था। किसी कारण परदेश आना पड़ा और अब यह कौरेया के फूल के रस को ही बहुत समझता है। मतलब संपन्न व्यक्ति भी यदि घर से बाहर जाता है तो उसे वहां जो सुविधाएं मिल जाए उसी से संतोष करना पड़ता है।

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