प्रसिद्ध उद्योगपति पद्मश्री श्रीमती कल्पना सरोज (Mrs. Kalpana Saroj)

जब हिम्मत करे इंसान

तब सहायता करे भगवान।।

दोस्तो आप सबने शूटर दादी के नाम से मशहूर चंद्रो तोमर का नाम तो अवश्य सुना होगा। यह उक्ति उन्हीं का है। लेकिन आज मैं शूटर दादी के बारे में बात नहीं करने वाला हूँ। आज मैं प्रसिद्ध उद्योगपति पद्मश्री श्रीमती कल्पना सरोज के बारे में बाते करने वाला हूँ। जिस पर शूटर दादी द्वारा कही वह पंक्ति शत—प्रतिशत फिट बैठती है। श्रीमती कल्पना सरोज जी ने हिम्मत की ओर उनका सहायता भगवान यानि पूरे कायनात ने की। आज वे किसी परिचय के मोहताज नहीं है।

आज भले ही पद्मश्री कल्पना सरोज 1200 करोड़ से अधिक की व्यापार की मालकिन है, पर उनकी संघर्षगाथा बिल्कुल अविश्वसनीय लगता है। अनुकुल ​परिस्थितियों में सफलता प्राप्त करना आसान है। परंतु प्रतिकूल परिस्थितियों में लीक से हटकर सफलता प्राप्त करना बिरलों से ही संभव है। भारतीय उद्योग जगत में और समाज में पद्मश्री कल्पना सरोज पलास के पेड़ की तरह ही हैं। सफलता प्राप्त करने के पूर्व कुछ भी उनके अनुकूल नहीं था। उनका जन्म गरीब परिवार में हुआ था। वह दलित, बौद्ध परिवार में पैदा हुई थी । शुरूआती दिनों में जहाँ उनका जीवन—यापन करना ही मुश्किल था, उद्योगपति बनने का सपना एक गल्प जैसा ही हो सकता है। गरीब, दलित, बौद्ध लड़की को पढ़ने का,सपने देखने का और सपने बुनने का अधिकार भारत जैसे देश में अभी भी नहीं है तो उसके समय में कितना मुश्किल काम रहा होगा, इसका अंदाजा लगाना भी कठिन है। क्योंकि कुछ चीजें जो कुछ के लिए सुलभ है वही कुछ के लिए दुर्लभ है। वे जिन्हें सुलभ है वे उनके मुश्किलों का अंदाजा नहीं लगा सकते हैं जिनके लिए दुर्लभ है।

कल्पना का जन्म महाराष्ट्र के जिला अकोला के एक छोटे से गाँव रोपरखेड़ा में सन् 1961 में हुआ था। उनके पिता एक पुलिस हवालदार थे। उनका एक संयुक्त परिवार था। जिसमें दो भाई तीन बहनें, दादा—दादी तथा चाचा—चाची रहा करते थे। कल्पना पूरे परिवार के साथ एक पुलिस क्वार्टर में रहती थी और पास के ही एक सरकारी विद्यालय में पढ़ती थी। वह पढ़ाई में तो होशियार थी पर ​दलित होने के कारण उनको शिक्षकों एवं सहपाठियों की उपेक्षा झेलनी पड़ती थी। बचपन में उसे घर के कामों में हाथ बँटाना पड़ता था जैसे विद्यालय से लौटते समय गोबर उठाना, खेत में काम करना और लकड़ियाँ चुनना। कल्पना जी कहती हैं कि उनके मामाजी का समाज में रसूख था। वे गाँव के प्रधान भी थे। लेकिन उनको कल्पना जी का पढ़ना—लिखना लड़की होने के नाते अच्छा नहीं लगता था वे चाहते थे कि कल्पना जी की शादी जल्दी से जल्दी हो जाये। उनकी बात कल्पना जी के पिताजी टाल नहीं सके। फलत: कल्पना जी की शादी महज 12 वर्ष की उम्र में जिस समय वे सातवीं कक्षा में पढ़ रही थी उनसे अधिक उम्र के एक लड़के से करवा दी गई। शादी के बाद वे मुंबई चली गई।

ससुराल में कल्पना जी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं हुआ। उन्हें तरह—तरह की यातनाएं दी जाती थी। उन्होंने खुद एक इंटरव्यु में बताया कि उनके ससुराल वाले उसे खाना नहीं देते ​थे, बाल पकड़कर बेरहमी से मारते थे, जानवरों से भी बुरा बर्ताव करते थे। कभी खाने में नमक को लेकर मारते थे तो कभी कपड़े साफ ना धुलने पर धुनाई हो जाती थी। यह सब कुछ कल्पना जी सह रही थी पर उनकी हालत बहुत दयनीय हो गई थी। लगभग 6 महीने के बाद उनके पिता उनसे मिलने आये तो उनकी यह दशा देखकर उन्हें अपने साथ गाँव वापस ले गये।

जब कल्पना जी ससुराल से मायके लाई गई तो यहाँ भी उसे समाज के ताना सहना पड़ा। आस—पड़ोस लोग तरह—तरह के ताना मारते थे। लोग कहते थे साथ में परिवार के बुजुर्ग भी कहते थे कि ससुराल से लड़की का वापस अर्थी ही आनी चाहिए। यानि जीवित ससुराल से वापस मायके आना एक तरह से गुनाह था। उनके पिताजी उसे दुबारा पढ़ाना चाहते थे, लेकिन चारो तरफ से मुश्किल और कटाक्ष के कारण उनका मन पढ़ाई में नहीं लगा। थककर आत्महत्या करने का निर्णय लिया। उन्होंने खटमल मारने वाली जहर की तीन बोतलें खरीदीं और उसे लेकर अपनी बुआ के यहाँ चली गयी। क्योंकि वह पुलिस क्वार्टर में रहती थी और उनके पिता पुलिस में हवलदार थे। पिताजी का नाम खराब न हो इसलिए वह बुआ के घर जाकर जहर की तीनों बोतलें एक साथ पी ली।उस समय उसकी बुआ चाय बना रही थी। बुआ जब चाय लेकर कमरे में आई तो देखा कि कल्पना के मुँह से झाग निकल रहा है। आनन—फानन में उसे डॉक्टर के पास ले गये। छोटा जगह होने के कारण उनका बचना मुश्किल लग रहा था। डॉक्टर बार—बार उसे बड़े अस्पताल में ले जाने के लिए कह रहे थे लेकिन तब तक पुलिस वाले भी आ गये जो उनके पिताजी के जानकार भी थे। सबने उनका ईलाज वहीं करने के कहा क्योंकि अगर उनकी मौत हो जाती तो पुलिसवाले की बदनामी होती। अंतत: उनकी जान बच गई। पर जो रिश्तेदार मिलने के लिए आते थे वे कहते थे कि ये तुम क्या कर रही थी? अगर तुम मर जाती तो लोग यही कहते कि महादेव (उनके पिता का नाम महादेव था) की बेटी जरूर कोई गलत काम की होगी जिससे उसे मरना पड़ा। वहीं अस्पताल में जब वह बच गई तो सोचा कि जब कुछ करके मरा जा सकता है तो इससे अच्छा है कि कुछ करके जिया जाए। यही से उनके जीवन में एक नया मोड़ आया। उन्हें अपने अंदर एक नई उर्जा महसूस हुई, अब वे जीवन में उँचाइ्यों को छूना चाहती थी।

इसके बाद वे कई जगह नौकरी पाने की कोशशि की पर छोटी उम्र और कम शिक्षा की वजह से सबसे पहले तो पुलिस में भर्ती नहीं हो सकी। नर्स बनना चाहती थी पर नहीं बन सकी।आर्मी में जाना चाही पर असफल रही। सिलाई का काम सीखकर काम शुरू की पर उसमें भी ज्यादा आमदानी नहीं हो रही थी। अंतत: मुंबई जाने का फैसला किया।

माँ उसे अकेली मुंबई भेजने के लिए तैयार नहीं थी। जब उसने ट्रेन में कूदकर जान देने की धमकी दी तो माँ राजी हो गई। कल्पना जी मुंबई आ गई एक चाचा के पास। वो सिलाई का काम जानती थी इसलिए चाचाजी उन्हें एक कपड़े की मिल में काम दिलाने ले गए। वह काम तो जानती थी पर बड़े शहर होने और लड़का—लड़की के एक साथ काम करने के डर के कारण वह मशीन चला नहीं सकी। अत: उसे दो रूपये प्रतिदिन के मजदूरी पर धागा काटने के काम पर रखा गया। कुछ दिनों तक धागा काटने का काम करने के बाद, वे डर पर काबू पा लिया और मशीन पर काम करने लगी, अब उन्हें सवा दो सौ रूपये महीने मिलने लगे। इसी बीच किसी बजह से इनके पिताजी की नौकरी छूट गई। अत: कल्पना जी ने पूरे परिवार को मुंबई अपने पास बुला ली।

धीर—धीरे जब सबकुछ ठीक होने लगा था, अचानक एक घटना घटी जो कल्पना जी को काफी आहत किया। उनकी बहन बीमार रहने लगी थी। पैसे के अभाव में उसका इलाज नहीं हो सका और एक दिन उसकी मौत हो गई। कल्पना जी को तब एहसास हुआ कि जीवन में गरीबी से बड़ी कोई बीमारी नहीं है। उसने निश्चय किया कि इस गरीबी रूपी बीमारी से वे अपने जीवन को बिल्कुल मुक्त कर लेगी। यानि ढेर सारा रूपया कमायेगी। वह टेलरिंग की कोर्स तो की ही थी। सोचने लगी कि बुटिक का काम भी शुरू करें। इसके लिए रूपया चाहिए था। लेकिन उसके पास तो रूपया था ही नहीं। इसलिए सरकार से लोन लेने के बारे में सोचा। काफी मेहनत के बाद वे सारे पेपर्स बनवाकर लोन लेने में सफल हुई। फिर एक दुकान किराये पर ली और काफी मेहनत करने लगी। 16—17 घंटे तक वह काम करने लगी। उसके मन में आया कि फर्नीचर का बिजनेस काफी लाभदायक है इसलिए इसे शुरू किया जाये। 50 हजार रूपया का लोन मिला ही था। एक शोरूम किराये पर लिया और मार्केट से फर्नीचर का सामान लाकर फर्नीचर का भी बिजनेस शुरू कर दी। इसी बीच जब उन्होंने लोन लेने के दौरान इसमें होने वाली परेशानियों को देखा एवं युवाओं को भटकते हुए देखा तो उसके मन में दूसरे युवाओं के लिए भी कुछ करने का मन हुआ। उसने शिक्षित बेरोजगारों को लोन दिलवाने के लिए एक शिक्षित बेरोजगार संगठन बनाई। जिसके मार्फत वह लोगों को लोन लेने में मदद कर सके। इस संगठन की ओर से समय—समय पर वह छोटे—छोटे प्रोग्राम आयोजित करती थी, जिसमें लोन मंजूर करने वाले अधिकारियों को भी बुलाती थी जिससे काफी मदद मिलती थी।

इसका फर्नीचर का बिजनेस बढ़िया चलने लगा फिर वह एक ब्यूटी पार्लर भी खोला। इसी दौरान उसने एक स्टील फर्नीचर के व्यापारी से दुबारा शादी की, जिससे एक पुत्री एवं एक पुत्र हुआ। पर दुख अभी भी कल्पना जी का पीछा नहीं छोड़ा था। उनके दूसरे पति की मृत्यु हो गई।

एक दिन एक आदमी कल्पना जी के पास आया और उसने अपना एक प्लॉट 2.5 लाख रूपये में बेचने का आफर दिया। कल्पना जी ने कहा कि 2.5 लाख तो उसके पास है ही नहीं वह यह प्लॉट कैसे खरीद सकती है। फिर उस आदमी ने कहा कि वह प्लॉट खरीद सकती है। वह चाहे तो एक लाख अभी दे दे बाकी बाद में। उसने जमा पूँजी और उधार लेकर 1 लाख रूपया उस प्लॉट के मालिक को दे दिया, लेकिन बाद में पता चला कि वह जमीन तो विवादस्पद है। हलांकि वह काफी कीमती प्लॉट था। कल्पना जी काफी मेहनत कर और दौड़—भागकर उस प्लॉट से जुड़े सारे मामले सुलझा लिेये। अब वह प्लॉट 50 लाख का हो गया। पर उस प्लॉट को डेवलप करने के लिए उसके पास रूपया नहीं था। इसलिए एक सिंधी डेवलपर से समझौता की और शेयर में उस प्लॉट को डेवलप करने के लिए सोची। यह बात उसके इलाके के लोगों को पचा नहीं कि एक बौद्ध महिला रियल स्टेट का बिजनेस करे। किसी ने उसकी  5 लाख की सुपारी दे दी। संयोग से हत्या की साजिश का उनको पता चला गया। उसने पुलिस से शिकायत की एवं गुंडे पकड़े भी गये। अपनी सुरक्षा के लिए वह पुलिस से रिवाल्वर के लाईसेंस के लिए अर्जी दी। जो उसे एक ही दिन में मिल गई। इस प्रकार वह अपने साथ एक रिवाल्वर रखने लगी। जब पुलिस वाले ने पूछा कि तुम रिवाल्वर तो ले रही हो पर क्या इसे चला भी पाओगी? तब उसने जबाव दिया कि जब तक मेरे रिवाल्वर में एक भी गोली शेष रहेगी कोई मुझे मार नहीं सकता है। अं​तत: उस प्लॉट पर निर्माण का काम पूरा हुआ और इसमें कल्पना जी को करीब 4.5 करोड़ रूपये का मुनाफा हुआ।

Shri NR Kamani द्वारा 1960 में Kamani Tubes  की स्थापना की गई थी। कंपनी अच्छी चल रही थी पर 1985 में Labour Unions और Management  के बीच विवाद होने के कारण कंपनी बंद हो गई। 1988 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कंपनी दुबारा शुरू हुई जिसमें कंपनी का मालिकाना हक workers  के पास था। अनुभवहीनता के कारण workers  कंपनी को चला नहीं पाया। और कंपनी पर कर्ज बढ़ता गया। अंतत: फिर कंपनी बंद हो गई और इसके workers भूखे मरने लगे। अ​ब तक कल्पना जी अपने इलाके में काफी चर्चित हो चुकी थी। इसलिए बहुत से लोग उसके पास आते थे, अपनी —अपनी समस्याओं को लेकर।  Kamani Tubes के workers भी उसके पास आये और उनसे विनती करने लगे कि उन्हें मरने से बचा लें। शुरू में तो कल्पना जी 116 करोड़ के कर्ज में डूबे 140 कोर्ट केस  में फँसी कंपनी  में हाथ डालने से मना कर दी । पर जब उसे मजदूरों की दयनीय हालत के बारे में बताया गया तो उनका हृदय पिघल गया। वे उन मजदूरों की खातिर काम करने के लिए तैयार हो गई।            कंपनी के बोर्ड में आते ही कल्पना जी ने सबसे पहले उन 10 लोगों की टीम बनाई जो अपने—अपने Field के जानकार थे। हलंकि वे लोग इस कंपनी के साथ तो काम करना नहीं चाहते थे पर कलपना जी के कारण वे वहाँ काम करने के लिए राजी हो गये। फिर उन्होंने कंपनी का एक रिपोर्ट तैयार करवाई जिसमें सभी लेनदारों की सूची एवं उधारी की रकम दर्ज थी। इससे यह पता चला कि कंपनी पर जो कर्ज था, उसमें आधे से ज्यादा तो ब्याज ही थी।

किसी ने उन्हें उधार देने वालें बैंकों के प्रमुखों से बात करने की सलाह दी और इसी दौरान उन्हें पता चला कि वित्त मंत्री साहब इसमें जरूर कुछ न कुछ मदद कर सकते हैं। वे तत्कालीन वित्त मंत्री जी से मिलकर बताई कि Kamani Tubes के पास कुछ है ही नहीं । अगर ब्याज और पेनल्टी माफ कर दें तो वे कर्जदाताओं को मूलधन लौटा सकती हैं। और अगर ऐसा नहीं हुआ तो कोर्ट कंपनी का Liquidation करने ही वाला है जैसा कि कमानी के बाकी दो कंपनियों का हुआ भी है। इससे बकायेदारों को कुछ भी नहीं मिलेगा।

वित्त मंत्री जी कल्पना जी को आश्वस्त किये कि वे जरूर कुछ करेंगे और उन्हें बैंकों के साथ मीटिंग करने के लिए बोले। बैंकों के साथ हुए मीटिंग में बैंक वाले कल्पना जी से बहुत प्रभावित हुए और वे न सिर्फ ब्याज और पेनल्टी माफ किये बल्कि मूलधन से भी 25 प्रतिशत कम भी किये।

कल्पना जी 2000 ई0 से कंपनी के लिए संघर्ष कर रही थी। सन 2006 ई में कोर्ट का निर्णय आया। कल्पना जी को कमानी इंडस्ट्रीज का मालिक बना दिया। इस निर्देश के साथ बैंक का लोन 7 साल में चुकाने का एवं मजदूरों का बकाया 3 साल में चुकाने का भी निर्देश था। कल्पना जी बैंक का लोन 1 साल में एवं मजदूरों का बकाया 3 महीने में ही चुका दिया। इसके साथ—साथ कंपनी का आधुनिकरण करते हुए धीरे—धीरे एक सिक कंपनी को लाभदायक यानि Profit देने वाली कंपनी बना दी। उनकी इस असराहनीय कार्य के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2013 ई0 में पद्मश्री से नवाजा और कोई बैंकिग बैकग्राउंड का नहीं होते हुए भी भारतीय महिला बैंक के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स में शामिल किया।

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