आयें युग का मान बदल दें

सदियों से शोषित-दलित और उपेक्षित, उपजाति, कुरी गोत्र में खंडित। अशिक्षा, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता से ग्रसित। बिन मांझी की नौका सी दिग्भ्रमित। कोटि-कोटि मानव का अज्ञान बदल दें। आयें युग का मान बदल दें। घूँट आँसुओं के पीते हैं जो. शोलों…

अमर शहीद जुब्बा सहनी के प्रति

जुब्बा चैनपुर का ध्रुवतारा, भारत का अनमोल लाल था। दीन -हीन असहायों का बल, मूक ह्रदय का झंकृत ताल था। जुब्बा नाम था उस शूरवीर का, निरंतर जलाये थे जो क्रान्ति की मशाल। जुब्बा नाम था, उस भारतरत्न का, भारत…

ग़ज़ल (३)

आपका आना कितना खुशगवार लगता है, पर इस तरह छोड़कर जाते क्यों हैं? हम भी मोहब्बत कम नहीं करते, आप इस तरह प्यार जताते क्यों हैं? आपको भी कुछ पाने की तमन्ना है, हमे इस तरह तरसाते क्यों हैं? हमने…

ग़ज़ल (२)

इस तरह मुस्कुरा कर नहीं सजा दीजिए, जुर्म क्या है मेरा सरकार बता दीजिए। इतने करीब रहके भी कितने दूर-दूर हैं, इस फासला को एकबार मिटा दीजिए। ये प्यार है, छलावा है या और कुछ, आपको क़सम मेरी ये राज…

ग़ज़ल (१)

चारों तरफ हवा है कि हवा नहीं है। ये मर्ज ऐसा है कि इसकी दवा नहीं है। खुदकुशी कर रही हैं, रोज-रोज हजारों लडकियां , आशिकों की शिक़ायत है, उनके लिए महबूबा नहीं है। उनके शह पर होती हैं क़त्ल…

मेरी अभिलाषा

हर घर में दीप जले, हर उपवन में फूल खिले। भूलकर गिले शिकवे, आपस में सब गले मिले। मेरी अभिलाषा है। जाति धर्म के लिए न कोई लड़े, सीमा सरहद पर न बहे ख़ून. न उजड़े मांग किसी का, न…

दौड़

जिन्दगी की इस दौड़ में कौन नहीं नजर आता है भागते हुए? नाम, यश, माया के मोह में नर्तकों सा नाचते हुए। खाली गोदाम हो गई तोड़ दिये दम हजारों भूख से तड़पते हुए, नाम जिस पर करोड़ों का लिखा…

हमें न चाँद चाहिए, न चमन चाहिए।

हमें न चाँद चाहिए , न चमन चाहिए। हमें अपने ही घर में अमन चाहिए। पड़ोसियों के ताप से कश्मीर पिघल रहा है। स्वच्छंदता के लिए असाम , नागालैंड मचल रहा है। आपसी वैमनस्यता की खाई में, बिहार, उड़ीसा और…

विश्व गुरू व्यास के प्रति

प्रति वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा को तुम्हारी याद लिए। आसमान में बदल उमड़ आते हैं। श्रद्धा - सुमन तुम्हें अर्पित करने को, वर्षा की कुछ बूंदे झड़ जाते हैं। मानव ही नहीं प्रकृति भी, तुम्हारे वियोग से विक्षिप्त हैं। नेत्रों से…

माँ

जाऊँ तो कहॉ जाऊँ माँ? व्यथा अपनी किसे सुनाऊँ माँ ? ग्लानी गरल पीकर कैसे? अरमानों की प्यास बुझाऊँ माँ। देखकर मेरी हालत ऎसी, कोई हँसते कोइ लजाते हैं। यह जग तो हैं,मधुर मिलन हेतु, मुझे तो निज भी दूर…