माँ

जाऊँ तो कहॉ जाऊँ माँ? व्यथा अपनी किसे सुनाऊँ माँ ? ग्लानी गरल पीकर कैसे? अरमानों की प्यास बुझाऊँ माँ। देखकर मेरी हालत ऎसी, कोई हँसते कोइ लजाते हैं। यह जग तो हैं,मधुर मिलन हेतु, मुझे तो निज भी दूर…

प्रार्थना

तन तेरी, मन तेरी। और माँ यह जीवन तेरी। है क्या मेरा जो करूं तुम्हें अर्पण ? जो तेरा है, तुम्हें करूं कैसे समर्पण? कली कुसुम की हार, संगीत की मधुर झंकार। विज्ञान लोक की अभिनव उपहार। ग्रंथों कि हर…

वन्दना

मातेश्वरी तू धन्य है करूँ कैसे बखान। करूँ नित दिन पूजा तेरी माँ दे दो वरदान। तुम्हारी कृपा से माँ मैंने, यह दैव दुर्लभ मानव तन पाया। तुम्हारी दया से फिर इसको, बल-बुद्धि विद्या का वतन बनाया। करूँ कैसे विनती…

मशाल एवं इंसान

मशाल लेकर जो खड़ा है, ढ़ूँढ़तें हैं लोग उसे अंधेरों में। कितना नासमझ है ये दुनिया। ढ़ूँढ़तें हैं निशान राख के ढ़ेरों में। कल तक जो अपने थे आज, एक लकीर की वजह से खड़े हैं गैरों में। सात नहीं…

मानव

आज का मानव एक सरल रेखा पर दौड़ रहे हैं बेतहाशा। क्षण भर में वे अपने लक्ष्य को पाने का करते हैं आशा। उन्हें फुरसत नहीं हैं, पीछे देखने की। उन्हें जरूरत नहीं है, बगल झाँकने की। उन्हें जरूरत नहीं…

कल और आज

सिमटती गई शनैः शनैः तम की चादर। छिपते गये चोरों की भांति नभ से नभचर। फैल गई भू पर रवि रश्मियाँ। बनी पुष्प खिलकर कलियाँ। खगकुल करने लगे किलोल। मानो खोल रहा तानशाह नृप का पोल। मधुकर दौड़े पुष्पों की…

गाँधी तेरे देश में

असत्य, हिंसा, दुराग्रह की बहती है, सदा, अविरल त्रिवेणी गंगा। व्यभिचार, भ्रष्टाचार में गोता लगा रहे हैं, देश-सेवक जनसेवक होकर नंगा। पश्चिमी कूड़ा-कर्कटों को सजा रहे हैं,सब अपने परिवेश में। गाँधी तेरे देश में। महावीर का मौन व्रत है। बुद्ध…

खोजो तो जरा।

खोजो तो जरा। पथ्थरों में ढृढता। पुष्पों में कोमलता। झड़नों में चंचलता। हिमखंड में शीतलता। मंद समीर में मादकता। वाणी में मधुरता। लवों पर माधुर्यता। मित्रों में मित्रता। शत्रुतों में बैरता। दम्पतियों में सरसता। युवाओं में चुम्बकता। मानव में समता।…

होली आई

रंग-गुलाल और लेकर फाल्गुनी वयार। मधुमास में होली आई। आम्र मंजरों की गंध। दरख्त के नव पल्लवों के संग। चहुँ ओर हरियाली लाई। मधुमास में होली आई। प्रकृति रानी सजी नव परिधान में। गा रही पीकी सुरीली तान में। भँवरों…

आयें युग का मान बदल दें

सदियों से शोषित-दलित और उपेक्षित, उपजाति, कुरी गोत्र में खंडित। अशिक्षा, अंधविश्वास, रूढ़िवादिता से ग्रसित। बिन मांझी की नौका सी दिग्भ्रमित। कोटि-कोटि मानव का अज्ञान बदल दें। आयें युग का मान बदल दें। घूँट आँसुओं के पीते हैं जो. शोलों…