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गुणहीन पशु

सप्तदश अध्याय नीति : 16—17

गुणहीन पशु

चाणक्य नीति के सप्तदश अघ्याय के सोलहवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि भोजन, नींद, भय तथा मैथुन करना ये सब बातें मनुष्यों एवं पशुओं में समान रूप से पायी जाती है किंतु ज्ञान मनुष्य में ही पाया जाता है। अत: जिस मनुष्य में ज्ञान नहीं हो उसे पशु ही समझना चाहिए।

वही सतरहवी नीति में आचार्य कह​ते हैं कि यदि मूर्ख व्यक्ति गुणी लोगों का आदर नहीं करते हैं तो इससे गुणी का कोई नुकसान नहीं होता। उन्हें आदर देनेवाले अन्य लोग मिल जाते हैं किंतु मूर्ख को गुणी लोग नहीं मिलते।

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