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जोश के साथ होश भी जरूरी

दुनियाँ के सभी क्षेत्रों में बहुत तेजी से विकास हो रहा है। अनेक विकसित देशों की सरकारें एवं स्वयंसेवी संस्थाएँ अल्पविकसित या पिछड़े देशों के सहायतार्थ अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम चला रहे हैं, ताकि कहीं भी गरीबी भुखमरी न रहे। हमारी सरकार आजादी के उपरांत अनेक कल्याणकारी योजनाओं के द्वारा देश को समुन्नत बनाने का प्रयत्न कर रही है, लेकिन हमारे यहाँ विकास की गति काफी धीमी है। इसका कारण सरकार को जनता की अपेक्षित सहयोग न मिलना, प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, जनता में आत्म विश्वास का अभाव इत्यादि हो सकता है। सोचनीय बिन्दु यह है कि आज भी सरकारी तंत्र में शीर्षस्थ पदाधिकारी के आचरण और उनकी मंशा पर संदेह किया जा सकता है, उससे कुछ पाने की अपेक्षाएँ नहीं की जा सकती है। इसके अलावा भी एक कारण है अपने देश में ऐसे सामाजिक तत्व हैं, जो विकास मार्ग में अवरोधक हैं। सरकार कानून बानाती है आम जनता के लाभ के लिए, प्रशासन उसे कड़ाई से लागू नहीं करते हैं। उन्हें डर है कि अगर वे इन कानूनों को कठोरता से लागू करेगें तो समाज उनके विरोध में खड़ा हो जायेगा। बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न हो जायेगी, आखिर वे भी तो उसी समाज से आये हैं। इसलिए वे मूकदर्शक बने रहते हैं। कानून बनाई जाती है, समयानुसार उसमें संशोधन भी की जाती हैं लेकिन कभी भी उस पर अमल नहीं किया जाता है। दहेज विरोधी कानून बनाया गया। अगर ईमानदारी से पूछे तो कौन इससे अछूता है? क्या बाल विवाह समाप्त हो सका? संविधान के प्रस्तावना में ही भेदभाव मिटाने की बातें हैं। क्या समाज से भेदभव मिटा, मेरा अभिप्राय लड़के—लड़कियाँ के बीच भेदभाव से है। ऐसे अनेक अधिनियम हैं जिसे सरकार बनाना ही अपना कर्त्तव्य समझती है, लागू करना उसके वस की बात नहीं है। इससे निष्कर्ष निकलता है कि जबतक सरकार एवं जनता के बीच सहयोग की भावना नहीं होगी, तबतक ऐसे विषयों से संबंधित अधिनियम का कोई औचित्य नहीं रहेगा। चूँकि विकास की गति ऐसे विषयों पर निर्भर करती है, अत: यह धीमी ही रहेगी।

आयें अब मुख्य विषय पर बातें करें, मेरा विषय है परिवार समाज और देश के विकास में बूढ़े बुजुर्गों की भूमिका क्या हो सकती है? आप सब जानते हैं कि प्रत्येक परिवार का मुखिया प्राय:बुजुर्ग होते हैं, क्योंकि वे अपेक्षाकृत अधिक अनुभवी एवं गंभीर होते हैं। परिवार को सुव्यवस्थित रूप से चलाने की एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी उनपर रहती है। अत: उन्हें बड़े धैर्य से काम करना पड़ता है। आजकल आधुनिकता के चक्कर में परिवार में बच्चे, युवा और बुढ़े—बुजुर्गों में प्राय: छत्तीस का आंकड़ा रहता है। बुजुर्ग उन लोगों पर शासक जैसे व्यवहार करते हैं और बच्चे— युवा स्वतंत्र रहना चाहते हैं। इन्हीं अहं के बीच कुछ ऐसी सामाजिक कुरीतियाँ पनप जाती है, जो अंतत: पूर परिवार के जिंदगी को नरकमय बना देती है। अल्पविकसित समाज में बाल विवाह बंद न होने का मुख्य कारण यही है। विशेषकर पिछड़े समाज के बुजुर्ग अधिक अंधविश्वासी, रूढ़ीवादी एवं पुराने सोच के होते है I वे पुरानी व्यवस्थाएँ, रीति—रिवाजो को ढोने में अपना शान एवं समझदारी समझते हैं। उनका यही अहं परिवार के लिए आत्मघाती सिद्ध होता है। प्राय: अल्पविकसित समाज में ही बाल विवाह का प्रचलन अधिक है, परिवार नियोजन की किरणें इनके ही घरों में नहीं पहुँची है। अनेक प्रकार के दुर्व्यसनों के शिकार इन्ही समाज के लोग अधिक होते हैं।

अत: निषाद समाज के बूढ़े—बुजुर्गों से मेरा आत्मीय अनुरोध है कि अपने परिवार, समाज को देश के मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आगे आये, और पुराने रीति—रिवाजो जो परिवार समाज के लिए घातक सिद्ध हो रहा है उसे त्याग दें। अन्य विकसित समाज परिवार के अनुकरण कर अपने अपने परिवार समाज का विकास करें। अपनें बच्चों का विवाह उसक शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक रूप से परिपक्व होने के बाद ही करें। अगर परिवार समाज के युवा दम्पति परिवार नियोजन कराना चाहते हैं तो उनके मार्गों के अवरोधक नहीं बनें बल्कि उन्हें प्रोत्साहित करें। बेटे और बेटियों में भेदभाव नहीं बरते। युवा दम्पति पर पुत्र प्राप्ति के लिए दबाव देकर अधिक पुत्रियाँ पैदा नहीं करवायें। दहेजप्रथा का विरोध करें, इसे समाज से समूल नष्ट करें। बच्चे युवाओं को धूम्रपान, मद्यपान इत्यादि दुष्परिणामों को प्यार से समझाकर इसे छोड़वाने का प्रयत्न करें।

संजय कुमार निषाद

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