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विजेता और पराजित में अंतर (Winners verses Losers)

विजेता  हमेशा एक समाधान का हिस्सा होता है।
पराजित हमेशा समस्या का हिस्सा होता है।

विजेता के पास हमेशा कुछ करने का एक प्रोग्राम रहता है।
पराजित के पास कुछ न करने का बहाना।

विजेता कहता है, मैं आपके लिए कर देता हूँ।
पराजित का कहना है कि यह मेरा काम नहीं है।

विजेता के पास समाधान है हर समस्या के लिए।
पराजित के पास समस्या है हर समाधान के लिए।

विजेता कहता है, यह काम मुश्किल जरूर है, लेकिन मुमकिन है।
पराजित का मानना है, यह काम मुमकिन हो सकता है, लेकिन बेहद मुश्किल है।

गलती करने पर विजेता कहता है, मैं गलत था।
पराजित गलती करने पर कहता है, इसमें मेरी गलती नहीं थी।

विजेता कमिटमेंट करता है।
पराजित केवल वायदा करता है।

विजेता के पास कामयाबी के सपने होते हैं।
पराजित के पास सिर्फ स्कीम्स होती हैं।

विजेता कहता है, मुझे कुछ करना चाहिए।
पराजित कहता है, कुछ होना चाहिए।

विजेता टीम का हिस्सा होता है।
पराजित टीम के हिस्से करता है।

विजेता उप​लब्धियों को देखता है।
पराजित तकलीफों को देखता है।

विजेता देखता है कि क्या संभव है।
पराजित देखता है कि क्या असंभव है।

विजेता हर किसी की जीत में विश्वास रखता है।
पराजित विश्वास रखता है कि उसे जीतने के लिए किसी को हारना होगा।

विजेता आने वाले कल को देखता है।
पराजित बीते हुए कल को देखता है।

विजेता थर्मोस्टेट जैसा होता है।
पराजित थर्मामीटर जैसा होता है।

विजेता सोचकर बोलता है।
पराजित बोलकर सोचता है।

विजेता नम्रता के साथ अपनी ठोस दलीलें पेश करता है।
पराजित कड़े शब्दों में कमजोर दलीलें पेश करता है।

विजेता करके दिखाता है।
पराजित कुछ होने का इंतजार करता है।

विजेता अपने उसूलों पर टिका रहता है और छोटी—मोटी बातों पर समझौता कर लेता है।
पराजित छोटी—मोटी बातों पर अड़ा रहता है और अपने उसूलों पर समझौता कर लेता है।

विजेता समानुभूति के इस विचार में विश्वास करता है कि दूसरों के साथ वैसा व्यवहार मत करो जो तुम चाहते हो कि दूसरे तुमसे न करें।
पराजित इस विचार में विश्वास करता है कि दूसरे के कुछ करने से पहले आप ही उसे कुछ कर दो।
(साभार: जीत आपकी, लेखक: शिव खेड़ा)

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