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मानव, धर्म और समाज

अगर धातुओं अथवा अन्या द्रव्यों के तरह मानव की भी शुद्धता मापने का कोई यंत्र होता तो कितना अच्छा होता। कहा जाता है कि मानव ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है एवं यह अंतिम कृति है।  लेकिन इसमें शक है। ऐसा लग रहा है कि आज तो मानव केवल रंग—रूप में ही मानव रह गया है। बल्कि इसके जरूरी एवं गैर जरूरी गुणें में आमूल—चूल परिवर्तन हो चुका है।  अन्य जीव जंतुओु पर अगर गौर करें तो वे अपने रूप—रंग  को अक्षुण्ण रखते हैं अपने सीमित गुणों की सुरक्षा बेहद सावधानी से कर रहा है।  लेकिन मानव हर दिन हर पल अपने गुणों में परिवर्तन ला रहा है।  मानव को बनाने का अगर ईश्वर का कोई उद्देश्य रहा होगा तो आज मानव इस उद्देश्य की पूर्ति के अलावा सारे कार्य कर रहे हैं। जरा सोचिये मानव इस जगत् के सबसे बुद्धिमान प्राणी है, पर क्या इसका जीवन एक साधारण सी चिड़िया जितना भी सरल है? बुद्धि का उद्देश्य एवं उपयोग जीवन को सरल बनाने का ही होगा। लेकिन ज्यों—ज्यों मानव अपनी बुद्धि को तेज करता जाता है, त्यों—त्यों जीवन कठिन होता चला जाता है।  नंगे बच्चे किलकारी मारता है। वही बड़े होकर लाखों का सूट पहनकर हँसने लायक भी नहीं रह पाता है। हम यह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि हम उन्नति कर रहें हैं या अवनति।  सुविधाओं में सुख ढूँढ़ने का प्रयास भी हमारा नाकारात्मक हो रहा है।  जो लोग बैलगाड़ी एवं हवाई जहाज दोंनों में सफर किये हो वे अंत में कह सकते हैं कि बैलगाड़ी में सफर करना ज्यादा आनंददायक था।  हाँ, जो मानव मूल्यों एवं गुणों से दूर हो चुका है उसे हवाई जहाज की ही यात्रा सुखद लगेगी।

आजकल आधुनिकता के नाम पर व्यवसायिकता पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है।  जो मानव मूल्यों पर ध्यान देता है उसे अशिक्षित माना जाता है।  मतलब शिक्षित होने का प्रमुख कारक है मानव में मानवता का न होना।

धर्म क्या है? इसकी परिभाषा क्या है? विद्वान एवं कथित धर्मगुरू चाहे जो कुछ भी कहे लेकिन धर्म को परिभाषित करना असंभव है।  हलांकि लोग इससे सहमत बहुत कम ही होंगे। पूरे विश्व में अनेक धर्मों के परचम लहराने वाले महामानवों की कमी नहीं दिखता।   स्वास्थ्य की परिभाषा क्या है? और क्या हो सकता है?  आसान सा लगने वाला सबाल का जबाव तलाशिये। स्वास्थ्य की परिभाषा तो यही कहा जा सकता है कि अस्वस्थ्ता का न होना को स्वास्थ्य कहा जा सकता है।  लेकिन इसमें स्वास्थ्य की तो बात ही नहीं हुई।

रोगों का न होना ही अगर स्वास्थ्य है तो रोग तो कई हैं और कई हो सकते हैं पर स्वास्थ्य तो कई नहीं हो सकते हैं।  स्वास्थ्य केवल एक हो सकता है और रोग अनेक।  अब जरा सोचिये क्या धर्म एक हो सकता है या अनेक।  वास्तव में धर्म केवल और केवल एक हो सकता है। जो अनेक हैं वह धर्म नहीं बल्कि अधर्म हो सकता है। यह कहना, सुनना जरा अटपटा सा लगता है कि धर्म के आजकल जो पुरोधा चिंतक या रक्षक माने जा रहे हैं असल में वह अधर्म के रक्षक हैं। यह सच है और हम सब यह जानते हैं और मानते भी हैं। 

लेकिन इसमें छोटी सी पेंच हैं। हम सब कथित धर्म को अधर्म मानते तो हैं लेकिन उस धर्म को नहीं जिस धर्म में हमारी श्रद्धा है, विश्वास है।  मतलब जिस धर्म के हम मानने वाले हैं उसके अलावा दुनिया के सभी धर्म हमें अधर्म लगता है।  लगता क्या है बल्कि हम यह सिद्ध कर देते हैं।  इसी तरह दूसरे धर्मों के मानने वालों का भी यही हाल है। अब जरा सोचिये, जब हर धर्म को अधर्म मानने वाले, कहने वाले लाखें—करोड़ों लोग हैं। मतलब जिसे हम धर्म समझते हैं, वह वास्तव में अधर्म है। धर्म के नामपर पूरी दुनिया में हो चुके और हो रहे नर संहारों को देखकर इसे आसानी से माना जा सकता है। समाज का निर्माण मानव जीवन को आसान बनाने के लिए हुआ होगा।  समाज में मानव एक—दूसरे की सेवा सहायता कर जीवन को आसान बनाते हैं। लेकिन जैसे—जैसे समाज सबल होता गया, इसके दायरे सीमित होता गया।  विकास और धर्म का असर समाज पर भी पड़ता गया।  अंतत: आजकल समाज एक तरह से धर्म का छोटा रूप हो गया।  वे सारी विसंगतियाँ जो धर्म में हैं धीरे—धीरे संगठित समाज में भी फैलती गई । यहाँ तक कुछ अलग प्रकार की विसंगतियाँ भी समाज में फैल चुकी।  समाज मानव समूहों का ही नाम है।  संगठित मानव समाज का उपयोग निज हित के लिए करने लगा।  आलकल एक समाज द्वारा दूसरे समाज का सामूहिक रूप से शोषण किया जा रहा है।  समाज का व्यवसायिक उपयोग घड़ल्ले से हो रहा है।  कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि समाज और धर्म से मानव को लाभ से ज्यादा हानि ही हुई है।  दुनिया के किसी भी प्राणी को मानव जैसा काम नहीं करना पड़ता है खाने के लिए। मानव को खने के लिए, रहने के लिए यानि अपनी हर जरूरतों को पूरा करने के लिए काम करना पड़ता है। जबकि अन्य प्राणी को यह आसानी से सर्वसुलभ है ।

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