प्रेम बंधन

पंचदश अध्याय नीति : 17 प्रेम बंधन चाणक्य नीति के पंचदश अघ्याय के सतरहवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि बंधन तो अनेक हैं,

मूर्ख कौन

पंचदश अध्याय नीति :12 मूर्ख कौन चाणक्य नीति के पंचदश अघ्याय के बारहवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मूर्ख व्यक्ति चारों वेदों तथा

चांडाल कर्म

पंचदश अध्याय नीति : 11 चांडाल कर्म चाणक्य नीति के पंचदश अघ्याय के ग्यारहवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि घर में कोई व्यक्ति

तत्व ग्रहण

पंचदश अध्याय नीति : 10 तत्व ग्रहण चाणक्य नीति के पंचदश अघ्याय के दसवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि शास्त्र अनंत हैं, विद्याएं

आचरण

पंचदश अध्याय नीति : 8-9 आचरण चाणक्य नीति के पंचदश अघ्याय के आठवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि भोजन वही है, जो ब्रह्मणों

सतसंगति

पंचदश अध्याय नीति: 7 सतसंगति चाणक्य नीति के पंचदश अघ्याय के सातवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि योग्य स्वामी के पास आकर अयोग्य

दयावान बनें

पंचदश अध्याय नीति: 1 दयावान बनें चाणक्य नीति के पंचदश अघ्याय के पहली नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में

मानव धर्म

चतुर्दश अध्याय नीति : 20 मानव धर्म चाणक्य नीति के चतुर्दश अघ्याय के बीसवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि दुष्टों का साथ छोड़

गोपनीय

चतुर्दश अध्याय नीति : 17 गोपनीय चाणक्य नीति के चतुर्दश अघ्याय के सतरहवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि बुद्धिमान व्यक्ति सिद्ध औषधि, धर्म,

मीठी वाणी

चतुर्दश अध्याय नीति : 10 मीठी वाणी चाणक्य नीति के चतुर्दश अघ्याय के दसवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जिससे अपना कोई कल्याण

मन की दूरी

चतुर्दश अध्याय नीति : 9 मन की दूरी चाणक्य नीति के चतुर्दश अघ्याय के नौवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति के

अहंकार

चतुर्दश अध्याय नीति : 8 अहंकार चाणक्य नीति के चतुर्दश अघ्याय के आठवी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मानव को दान, तप, शूरता,

एकता

चतुर्दश अध्याय नीति : 4 एकता चाणक्य नीति के चतुर्दश अघ्याय के चौथी नीति में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि शत्रु चाहे कितना बलवान हो,

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