विश्व गुरू व्यास के प्रति

प्रति वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा को तुम्हारी याद लिए। आसमान में बदल उमड़ आते हैं। श्रद्धा - सुमन तुम्हें अर्पित करने को, वर्षा की कुछ बूंदे झड़ जाते हैं। मानव ही नहीं प्रकृति भी, तुम्हारे वियोग से विक्षिप्त हैं। नेत्रों से…

माँ

जाऊँ तो कहॉ जाऊँ माँ? व्यथा अपनी किसे सुनाऊँ माँ ? ग्लानी गरल पीकर कैसे? अरमानों की प्यास बुझाऊँ माँ। देखकर मेरी हालत ऎसी, कोई हँसते कोइ लजाते हैं। यह जग तो हैं,मधुर मिलन हेतु, मुझे तो निज भी दूर…