माँ

जाऊँ तो कहॉ जाऊँ माँ? व्यथा अपनी किसे सुनाऊँ माँ ? ग्लानी गरल पीकर कैसे? अरमानों की प्यास बुझाऊँ माँ। देखकर मेरी हालत ऎसी, कोई हँसते कोइ लजाते हैं। यह जग तो हैं,मधुर मिलन हेतु, मुझे तो निज भी दूर…