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एकलव्य की गुरु भक्ति और समर्पण

प्राचीन भारत के एक छोटे से जंगल में, निषाद जनजाति का एक बालक रहता था जिसका नाम एकलव्य था। वह जन्म से एक शिकारी समुदाय का सदस्य था, लेकिन उसमें असाधारण कौशल और उच्च महत्वाकांक्षाएं थीं। वह जानता था कि उसकी नियति साधारण नहीं थी। एकलव्य का सबसे बड़ा सपना था कि वह एक महान धनुर्धर बने। वह अपने समय के सबसे प्रसिद्ध आचार्य, गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा प्राप्त करना चाहता था।

गुरु द्रोणाचार्य के पास पहुंचना

एक दिन एकलव्य ने अपनी इच्छा को अपने माता-पिता से साझा किया। उन्होंने अपने बेटे को आशीर्वाद दिया और कहा, “तुम्हारी लगन और मेहनत तुम्हें सफलता की ओर ले जाएगी।” एकलव्य ने अपने मन में निश्चय कर लिया और गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम का मार्ग पकड़ लिया।

गुरु द्रोणाचार्य उस समय हस्तिनापुर के राजकुमारों को शस्त्र विद्या सिखा रहे थे। उनके शिष्यों में अर्जुन, युधिष्ठिर, भीम, दुर्योधन जैसे योद्धा शामिल थे। एकलव्य ने विनम्रतापूर्वक गुरु द्रोणाचार्य के चरणों में झुककर कहा,
“गुरुजी, मैं आपकी शरण में आया हूँ। कृपया मुझे धनुर्विद्या की शिक्षा दें।”

द्रोणाचार्य ने देखा कि वह एक वनवासी बालक है। उन्होंने गंभीर स्वर में उत्तर दिया,
“मैं क्षत्रियों और राजकुमारों को सिखाने का वचन ले चुका हूँ। मैं तुम्हें शिक्षा नहीं दे सकता।”

यह सुनकर एकलव्य बहुत निराश हुआ, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने सोचा, “अगर गुरु मुझे सीधे शिक्षा नहीं दे सकते, तो मैं अपनी मेहनत और भक्ति से उन्हें अपने भीतर महसूस करूँगा।”

मूर्ति बनाकर शिक्षा प्राप्त करना

एकलव्य ने जंगल में एक शांत स्थान चुना और वहाँ गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की एक मूर्ति बनाई। उसने उस मूर्ति को अपना गुरु मान लिया और खुद से धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा।

वह हर दिन सूरज उगने से पहले उठता और अपने अभ्यास में लग जाता। उसकी भक्ति और मेहनत इतनी गहरी थी कि वह धीरे-धीरे धनुर्विद्या के हर पहलू में निपुण हो गया। एकलव्य ने खुद को एक ऐसा धनुर्धर बना लिया जो किसी भी चुनौती का सामना कर सकता था।

कुत्ते का मुँह तीरों से बंद करना

एक दिन, गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों के साथ जंगल में शिकार पर गए। वहाँ उन्होंने देखा कि एक कुत्ते का मुँह बिना चोट पहुँचाए तीरों से बंद कर दिया गया है। यह देखकर सभी आश्चर्यचकित रह गए।

द्रोणाचार्य ने कहा, “यह किसी साधारण व्यक्ति का काम नहीं हो सकता। यह एक महान धनुर्धर की कला है। हमें यह जानना होगा कि यह अद्भुत कार्य किसने किया है।”

उन्होंने कुत्ते का पीछा किया और जल्द ही देखा कि एकलव्य अपने अभ्यास में लीन था।

गुरु और शिष्य का संवाद

द्रोणाचार्य उसके पास पहुँचे और पूछा,
“तुम कौन हो, और तुमने यह धनुर्विद्या कहाँ से सीखी?”

एकलव्य ने विनम्रता से उत्तर दिया,
“गुरुजी, मैं आपका शिष्य हूँ। मैंने आपकी मूर्ति को अपना गुरु मानकर यह विद्या सीखी है।”

द्रोणाचार्य उसकी बात सुनकर अचंभित रह गए। उन्होंने देखा कि एकलव्य का कौशल अद्वितीय था।

गुरु दक्षिणा की माँग

गुरु द्रोणाचार्य को यह एहसास हुआ कि एकलव्य का कौशल उनके सबसे प्रिय शिष्य अर्जुन के लिए चुनौती बन सकता है। उन्होंने एकलव्य की परीक्षा लेने के लिए उससे कहा,
“यदि तुम मुझे अपना गुरु मानते हो, तो मुझे गुरु दक्षिणा में तुम्हारे दाहिने हाथ का अंगूठा चाहिए।”

यह सुनकर एकलव्य कुछ पल के लिए मौन हो गया। लेकिन उसने न तो कोई प्रश्न किया और न ही किसी प्रकार की नाराजगी दिखाई। उसने बिना झिझके अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काटकर गुरु द्रोणाचार्य के चरणों में अर्पित कर दिया।

एकलव्य का समर्पण और आदर्श

अंगूठा खोने के बाद भी एकलव्य ने धनुर्विद्या का अभ्यास नहीं छोड़ा। उसने बचे हुए अंगुलियों से तीर चलाने का अभ्यास किया और अपने कौशल को बनाए रखा। उसकी लगन और समर्पण की कहानी ने उसे अमर बना दिया।

कहानी से सीख

  1. गुरु के प्रति भक्ति: एकलव्य ने दिखाया कि सच्चे गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण से असंभव कार्य भी संभव हो सकते हैं।
  2. कड़ी मेहनत: साधनों की कमी के बावजूद, एकलव्य ने खुद को साबित किया।
  3. नम्रता और विनम्रता: उसने अपने गुरु के हर आदेश को मानकर आदर्श शिष्य का उदाहरण प्रस्तुत किया।
  4. आत्मनिर्भरता: उसने यह सिखाया कि हर स्थिति में खुद पर विश्वास करना जरूरी है।

1 thought on “एकलव्य की गुरु भक्ति और समर्पण”

  1. यह कहानी साहस और धनुर्विद्या की है, लेकिन मैंने एकलव्य की रज़ को प्यार से समझा। जब भी गुरु ने मनाया, तो वह चुनौती लिख गया और अपनी मिट्टी की मूर्ति का अभ्यास करने लगा! धीरे-धीरे गुरु की आँखों में भी आश्चर्य होने लगा, जैसे एक बच्चा अपनी बाली को चोट न मानकर उसकी गली खोल देता है। सच में, एकलव्य ने अपने गुरु को अपनी दक्षिणा के लिए एक ताकतवर अनुभव दिया!baseball bros io

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