गुरू गोविन्द दोऊँ खड़े

हमारे समाज में गुरू (शिक्षक) को गोविन्द (ईश्वर) से भी बढ़कर सम्मान दिया जाता है। इसलिए कहा गया –

गुरू गोविन्द्र दोऊँ खड़े काके लागूँ पायं
बलिहारी गुरू की जो गोविन्द दियो बताय।।

अर्थात शिक्षक और ईश्वर एक साथ मिले तो पहले शिक्षक को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि ईश्वर के बारे में उन्हीं से ज्ञान होता है। आधुनिकता के इस दौर में जहाँ सभी रिश्ते-नाते के बीच खटास पैदा हो रही है और रिश्ते बेईमानी सी लगने लगा है। गुरू शिष्य के रिश्ते भी अछूता नहीं रहा। आजकल शिक्षालयों की कई श्रेणी हो गई और गुरू-शिष्य के नाम भी अलग-अलग हो गये। मसलन निजि (व्यवसायिक) मॉडल स्कूल में टीचर-स्टुडेंट, राजकीय विद्यालय में शिक्षक-छात्र एवं आध्यात्मिक, धार्मिक संस्थाओं द्वारा संचालित उपेक्षित एवं पिछड़े वर्गों के लिए आश्रम रूपी शिक्षालय में गुरू-शिष्य।

गुरू शिष्य के रिश्ते को ताड़-ताड़ करने वाली घटना लगभग तीनों प्रकार के विद्यालयों में घटित हो रही है। माॅडल स्कूल में टीचर स्टुडेंट से इश्क फरमाते रहे हैं। राजकीय विद्यालय में छात्राओं का यौन शोषण हो रहा है एवं आश्रम द्वारा संचालित पाठशाला के गुरूजी, अपने शिष्या के साथ बलात्कार कर रहे हैं। आजकल आपको आधुनिक विद्यालय, महाविद्यालय में अनेक मटुकनाथ मिल जायेंगे, जो गुरू-शिष्य के रिश्ते को कलंकित कर प्रेम की नई परिभाषा दे रहे हों।

दिल्ली नगर निगम ने एक प्रस्ताव पारित कर निगम के बालिका विद्यालयो में शिक्षकों द्वारा यौन शोषण की बढ़ती घटना को देखकर वहाँ से पुरूष शिक्षक को हटाने की घोषणा की है। यह कदम सराहनीय तो कहा जा सकता है, लेकिन भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। व्यवहारिक तौर पर यह सब जगह संभव भी नहीं है, और भविष्य में इससे दूसरी परेशानी भी उत्पन्न हो सकती है। यह कदम अनुचित तो नहीं है लेकिन दूसरे विकल्पों की भी तलाश की जानी चाहिए थी, क्योंकि सरकार सह-शिक्षा पर भी जोर दे रही है, ताकि बालक-बालिकाओं का सर्वांगीण विकास हो सके।

हाल में ही बलसाड़ (गुजरात) में नीलपर्ण आश्रम द्वारा संचालित पाठशाला के एक गुरूजी द्वारा अपनी ही नाबालिग शिष्या के साथ बलात्कार किया गया। छात्रा द्वारा पाठशाला के प्राचार्य महोदय से इस घटना की शिकायत करने पर मामला पुलिस को सौंपा गया। इस घटना के बाद पाठशाला के अन्य छात्राओं द्वारा वहाँ के प्राचार्य पर भी यौन-शोषण का आरोप लगाया गया। यह घटना शर्मनाक एवं निंदनहीय तो हैं ही साथ ही समाज एवं सरकार को सोचने के लिए बाध्य भी कर रही है। समाज एवं सरकार को सतर्क रहने की आवश्यकता है ताकि इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति नहीं हो। ऐसे चरित्रहीन टीचर, शिक्षक एवं गुरूओं के लिए कठोरतम सजा का प्रावधान हो, ताकि दूसरा कोई इस तरह की नीच हरकत नहीं कर सके। अन्यथा भविष्य में हमारी बहनें, बेटियाँ, गुरूजी के बारे में ऐसा कहेगी-

गुरू बनके भक्षक खड़े कैसी लागूँ पाय।
अत्याचारी गुरू ने आबरू दियो लुटाय।।

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